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Mehman Ka Panna (18)

मुस्कानों में जहर को देखा
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घर के ऊपर घर को देखा
और भागते शहर को देखा

किसे होश है एक दूजे की
मजलूमों पे कहर को देखा

तोता भी है मैना भी है
मगर प्यार में कसर को देखा

हाथ मिलाते लोगों के भी
मुस्कानों में जहर को देखा

चकाचौंध है अंधियारे में
थकी थकी सी सहर को देखा

लक्ष्मी के सेवक के दिल में
कोमलता पे असर को देखा

पानी को अब खेत तरसते
शहर बीच में नहर को देखा

बढ़ता जंगल कंकरीट का
जहाँ सिसकते शजर को देखा

कहाँ काफिया क्या रदीफ है
सुमन कभी न बहर को देखा
सादर
श्यामल सुमन

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पुण्य प्रसून बाजपेयी

2019 की दौड में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी अगुवाई कर रहे है तो
अगुवाई करते नेता के पीछे खडे क्षत्रप की एक लंबी फौज है जो अपने अपने
दायरे में खुद की राजनीतिक सौदेबाजी के दायरे को बढा रहे है । इस कडी में
ममता , मायावती , अखिलेश , चन्द्रबाबू, चन्द्रशेखर राव, कुमारस्वामी ,
तेजस्वी , हेमतं सोरेन ,नवीन पटनायक सरीखे क्षत्रप है । लेकिन जैसे जैसे
वक्त गुजर रहा है वैसे वैसे तस्वीर साफ होती जा रही है कि राजनीतिक बिसात
बनेगी कैसी ।ध्यान दे तो नरेन्द्र मोदी की थ्योरी राष्ट्रवाद को लेकर रही
है । इसलिये वह चार मुद्दो को उटा रहे है । पहला विदेशो में मोदी की वजह
से भारत का डंका बज रहा है । दूसरा, डोकलाम में चीन को पहली बार मोदी की
कूटनीति ने ही आईना दिखा दिया । तीसरा , सर्जिकल स्ट्राइक के जरीये
पाकिस्तान धूल चटा दी । और चौथा हिन्दुत्व के रास्ते सत्ता चल रही है ।
और इसके लिये वह नार्थइस्ट में बांग्लादेशियो को खदेडने के लिये कानून
बनाने से भी नहीं चूक रही है । लेकिन राहुल गांधी की थ्योरी खुद को
राष्ट्रवादी बताते हुये अब मोदी के राष्ट्रवाद की थ्योरी तले इक्नामी के
अंधेरे को उभार रही है । राहुल गांधी का कहना है राष्ट्रवादी तो हम भी है
। और जहा तक हिन्दुत्व की बात है तो जनेउधारी तो हम भी है । लेकिन दुनिया
भर में डंका पिटने के बावजूद मोदी का राष्ट्रवादी गरीबो के लिये कुछ नही
कर रहा है ये सिर्फ कारपोरेट हित साध रहा है । यानी 2019 की तरफ बढते कदम
मोदी की व्यूह रचना में राहुल की सेंध को ही इस तरह जगह दे रहे है जैसे
एक वक्त की काग्रेस की चादर अब बीजेपी ने ओढ ली है और गरीब गुरबो का
जिक्र कर काग्रेस में समाजवादी-वामपंथी सोच विकसित हो गई है । यानी 2019
की बनती तस्वीर में क्षत्रपो के सामने संकट पाररंपरिक जाति और धर्म के
मुद्दे के हाशिये पर जाने से उभर रहा है । यानी आर्थव्.यवस्था को लेकर
जिस तरह काग्रेस सक्रिय हो चली है और राममंदिर को जिस तरह मोदी के साथ
संघ परिवार ने भी चुनाव तक टाल दिया है उसमें जातिय समीकरण के आधार पर
राजनीति करने वाले क्षत्रपो के सामने ये संकट है कि उनका वोट बैक भी उस
विकास को खोज रहा है जो उनके पेट और परिवार से जा जुडा है । इससे
क्षत्रपो की सौदेबाजी भी खासी कमजोर हो चली है । यानी इस तस्वीर का पहला
पाठ तो यही है बीजेपी क्षत्रपो को जीने नहीं देगी और काग्रेस क्षत्रपो को
अपनी शर्तो पर समझौता कराने की दिशा में ले जायेगी । राहुल प्रियका की
जोडी काग्रेस में आक्सीजन भर रही है या फिर क्षत्रपो के सामने जीवन मरन
का संकट खडा कर रही है । ये सवाल धीरे धीरे इसलिये बडा होता जा रहा है
क्योकि काग्रेस के कदम एकला चलो या फिर लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीटो
पर चुनाव लडकर अपनी संख्या को बढाने के फार्मूले की तरफ बढ चुके है । और
ये सब कैसे हो रहा है ये देखना बेहद दिलचस्प है । क्योकि राहुल और
प्रियंका एक साथ जब चुनाव प्रचार के लिये उतरेगें तो इसका मतलब साफ है कि
यूपी बिहार झारखंड बंगाल, आध्र प्रदेश और उडीसा को लेकर साफ थेयोरी होगी
कि क्षत्रपो को राज्यो में अगुवाई की बात कहकर लोकसभाचतुनाव में ज्यादा
से द्यादा सीट खुद लडे । और मोदी विरोध की थ्योरी के सामानातंर पं बंगाल,
आध्रप्रेदश और उडिसा में किसी भी क्षत्रप के साथ समझौता ना करें । इस
थ्योरी को सिलसिलेवार समझे । यूपी में एक तरफ मायावती को लेकर मुस्लिम
समेत जाटव छोड बाकि दलित जातियो में ये सवाल अब भी है कि क्या चुनाव के
बाद मायावती सत्ता के लिये कही बीजेपी के साथ तो खडा नहीं हो जायेगी । तो
दूसरी तरफ अखिलेश के सामने यादव वोट बैक के अलावे ओबीसी जातियो के बिखराव
का संकट भी है और मायावती के साथ गठबंधन के बावजूद दलित वोट का ट्रासंभर
ना होने की स्थिति भी है । फिर काग्रेस को लाभ सीधा है । पहला, -काग्रेस
आर्थिक आधार पर अपने पारंपरिक वोट बैक को जोडने उतरेगी । तो दूसरा ,
महिला, युवा और अगडी जातियो के वोट को प्रियंका के आसरे जोडेगी । तो यूपी
से सटे बिहार झरखंड में काग्रेस अपनी सौदेबाजी के दायरे को बढा रही है
।इसलिये बिहार में तेजस्वी हो या झरखंड में सोरेन । दोनो के सामने
काग्रेस का प्रस्ताव साफ है , -तेजस्वी-सोरन सीएम बने लेकिन लोकसभा की
सीट ज्यादा काग्रेस के पास होगी । और ज्यादा सीटो पर चुनाव लडने का
फार्मूला ही पं बंगाल और आध्रपर्देश में काग्रेस को गटबंधन के बोझ से
मुक्त कर चुका है । उसलिये काग्रेस ने बंगाल में ममता बनार्जी के साथ तो
आध्र में चन्द्रबाबू के साथ मिलकर चुनाव ना लडने का फैसला किया है । यानी
काग्रेस इस हकीकत को बाखूबी समझ रही है कि लोकसभा चुनाव में जिसके पास
ज्यादा सीट होगी उसकी दावेदारी ही चुनाव के बाद पीएम के उम्मीदवार के तौर
पर होगी । और इसके लिये जरुरी है अपने बूते चुनाव लडना । तो ऐसे में
प्रियंका की छवि कैसे नरेन्द्र मोदी के औरे को खत्म करेगी इसपर काग्रेस
का ध्यान है । क्योकि 2014 में नरेन्द्र मोदी जिस हंगामे और जिस तामझाम
के साथ आये ये कोई कैसे भूल सकता है । और तब प्रचार में बीजेपी कही नहीं
थी सिर्फ मोदी थे । लेकिन इसके उलट प्रियंका गांधी की इंट्री बेहद खामोशी
से हुई । काग्रेस मुख्यालय में नेम प्लेट टांगने से लेकर कार्यकत्ताओ से
बिना हंगामे मिलने के तौर तरीके ने ये तो साफ जतला दिया कि प्रिंयका को
किसी प्रचार की जरुरत नहीं है । और काग्रेस का मतलब ही नेहरु गांधी
परिवार है । लेकिन बीजेपी यहा भी अपने ही कटघरे में फंस गई । जब उसने
खामोश प्रियका को खानदान और बिना हंगामे के राजनीति तले सिर्फ परिवार के
अक्स में देखना शुरु किया । यानी प्रिंयका की छवि बीजेपी ने ही अपनी
आलोचना से इतनी रहस्मयी और जादुई बना दिया कि प्रियका के बारे में जानने
के लिये वोटरो में भी उत्सुकता जाग गई । और काग्रेस ने प्रियंका की छवि
को मुद्दो को आसरे जिस तरह उभारने की कोशिश शुरु की है वह ना सिर्फ
प्रियाका को दिरा गांधी से जोड रही है बल्कि इंदिरा के दौर में जिस तरह
गरीबी हटाओ का नारा बुलंद हुआ । और जिसतरह मोदी के कारपोरेट प्रेम तले
किसान मजदूर का सवाल काग्रेस उटा रही है उसमें चाहे अनचाहे 2019 का चुनाव
अमीर बनाम गरीब की तरफ बढता जा रहा है । तो सवाल तीन है । पहला, क्या
प्रियका को सिर्फ यूपी तक सीमित रखा जायेगा । दूसरा , क्या प्रिंयका को
यूपी के सीएम के तौर पर प्रजोक्ट भी किया जायेगा । -तीसरा , क्या
प्रिंयका की छवि राहुल के लिये मुश्किल पैदा करेगा । पर इन सवालो का जवाब
भी काग्रेस के पास है । ध्यान से परखे तो प्रिंयका गांधी को चुनावी
मैदान में तब उतारा गया जब राहुल गांधी की छवि पप्पू से इतर एक परिपक्व
नेता के तौर पर बनने लगी । फिर राहुल गांधी ने अपनी राजनीति से मोदी को
कारपोरेट के साथ खडा करने में राजनीतिक सफलता पायी । और -तीसरा , किसान
और बेरजगारी के सवाल को जिस तरह राहुल ने मथा उसका ठीकरा मोदी सत्ता पर
फूटा । और इसी अक्स में प्रियका का राजनीतिक इन्ट्री ही राहुल गांधी ने
इस स्ट्रेटजी के साथ किया कि इंदरा की छवि में गरीबो के सावल को साथ लेकर
अगर प्रयका प्रचार मैदान में कूदेगी तो मोदी का औरा खत्म होगा ।

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ललित गर्ग

भारत के अमीर और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और ज्यादा गरीब। इस बढ़ती असमानता से उपजी चिंताओं के बीच देश में करोड़पतियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में भारत में मिलियनेयर क्लब यानी करोड़पतियों के क्लब में 7,300 नए जुुड़े हैं। इस तरह देश में करोड़पतियों की तादाद 3.43 लाख हो चुकी है, जिनके पास सामूहिक रूप से करीब करीब 441 लाख करोड़ रुपये की दौलत है। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि भारत के मात्र नौ अमीरों के पास जितनी संपत्ति है वह देश की आधी आबादी के पास मौजूदा कुल संपत्ति के बराबर है। इस तरह धन एवं संपदा पर कुछ ही लोगों का कब्जा होना, अनेक समस्याओं का कारक हैं, जिनमें बेरोजगारी, भूख, अभाव जैसी समस्याएं हिंसा, युद्ध एवं आतंकवाद का कारण बनी है। अराजकता, भ्रष्टाचार, अनैतिकता को बढ़ावा मिल रहा है।
       चिंताजनक तथ्य यह है कि गरीब की गरीबी दूर नहीं हो रही। गरीब और अमीर के बीच खाई लगातार चैड़ी होती जा रही है। इस बढ़ती खाई की त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति और भी भयावह बनती जा रही है। वास्तव में यह स्थिति है कि करोड़ों लोगों को भरपेट खाने को नहीं मिलता। वे अभाव एवं परेशानियों में जीवन निर्वाह करते हैं। प्राचीन समय में आदमी गरीबी एवं भूख से मर जाता था। आज उसे मरने भी नहीं दिया जाता, दुःख, अभाव, पीड़ा एवं भूख भोगने के लिये जिन्दा रखा जाता है। क्योंकि कोई मरता है तो सरकार के लिये खतरा पैदा होता है, उसकी सफलताओं पर बदनुमा दाग लगता है, उसकी निन्दा-आलोचना होता है। वह तो मरने के लिये भी स्वतंत्र नहीं है और गरीबी भोगते हुए जिन्दा रहने के लिये अभिशप्त है। यह कैसा सुशासन है? यह कैसी समाज-व्यवस्था है? इस स्थिति को तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक स्वामित्व के सीमाकरण को स्वीकार नहीं किया जाता। कह तो सभी यही रहे हैं--”बाकी सब झूठ है, सच केवल रोटी है।“ रोटी केवल शब्द नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी परिभाषा समेटे हुए है अपने भीतर। जिसे आज का मनुष्य अपनी सुविधानुसार परिभाषित कर लेता है। रोटी कह रही है-”मैं महंगी हूँ तू सस्ता है।“ यह मनुष्य का घोर अपमान है। रोटी कीमती, जीवन सस्ता। मनुष्य सस्ता, मनुष्यता सस्ती। और मनुष्य अपमानित नहीं महसूस कर रहा है। यह सबसे बड़ा खतरा है। जीवन मूल्यहीन और दिशाहीन हो रहा है। हमारी सोच जड़ हो रही है। इन्हीं विषम एवं विसंगतिपूर्ण स्थितियों के बीच अमीरों को ही महिमामंडित किया जा रहा है। ऐसा ही एक अमीरों का आयोजन स्विट्जरलैंड के शहर दावोस में होने जा रहा है, यह विश्व आर्थिक मंच का सम्मेलन है जिसमें दुनिया के प्रमुख नेता, उद्योगपति और अर्थशास्त्री समूचे विश्व की आर्थिक हालत और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। अमीरों की जमात का यह सम्मेलन हर साल इसी शहर में होता है और तभी पता भी लगता है कि दुनिया के अमीर-गरीब का हाल क्या है। इस सम्मेलन से ठीक पहले दुनिया से गरीबी दूर करने का बीड़ा उठाने वाले संगठन आॅक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट जारी की है। जिसमें अमीरों की वैभव-संपत्ति, रुपए-पैसे में और इजाफा होने की बात कही गयी है। यह खबर चैंकाने वाली नहीं है कि अमीर पहले के मुकाबले और बड़े धनपति हो रहे हैं। चैंकाने वाली बात यह है कि पिछले साल भारत के अरबपतियों की संपत्ति में रोजाना बाईस अरब रुपया इजाफा हुआ और एक फीसद अमीरी की संपत्ति तो साल भर के भीतर उनतालीस फीसद तक बढ़ गई और नौ अमीरों ने देश की आधी आबादी के पास मौजूद कुल संपत्ति के बराबर अपना खजाना भर लिया। दूसरी ओर गरीबों की संपत्ति का ग्राफ मात्र तीन फीसद बढ़ा।
             विचारणीय तथ्य तो यह है कि भारत में अमीरों की चांदी उस वक्त में हुई जब देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाली के संकेत दे रही है, औद्योगिक उत्पादन उत्साहवर्धक नहीं रहा, सरकारी और निजी क्षेत्र, दोनों में ही नौकरियां तेजी से खत्म की जा रही हैं और बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है। पिछले साल कई महीनों तक रुपया अमेरिकी डाॅलर के मुकाबले कमजोर पड़ा रहा, पेट्रोल-डीजल ने लोगों के पसीने छुड़ा दिए थे और देश का कृषि क्षेत्र और अन्नदाता किसान अपनी बदहाली पर आज भी रो रहा है। देश के युवा सपने चरमरा रहे हैं। इन जटिल हालातों में सवाल है कि अमीरों के इस बढ़ते खजाने पर किसको और क्यों खुश होना चाहिए? ऐसी कौनसी ताकते हंै जो अमीरों को शक्तिशाली बना रही है। गरीबी को मिटाने का दावा करने वाली सरकारें कहीं अमीरों को तो नहीं बढ़ा रही है? जीएसटी एवं नोटबंदी के कारण जटिल होते हालातों के बीच इन तथाकथित अमीरों की सम्पत्ति का एवं अमीरी का बढ़ना सरकार की नीतियों पर एक सन्देह पैदा करता है।
समस्या दरअसल गरीबी को समाप्त करने की उतनी नहीं, जितनी कि संतुलित समाज रचना को निर्मित करने और मिलने वाले लाभ के न्यायसंगत बंटवारे की है। समृद्धि के कुछ द्वीपों का निर्माण हो भी गया तो कोई देश उनके बूते दीर्घकालीन तरक्की नहीं कर सकेगा। उसके लिए संसाधनों और पूंजीगत लाभ के तार्किक वितरण पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। यदि समय रहते समुचित कदम नहीं उठाए गए तो विषमता की यह खाई और चैड़ी हो सकती है और उससे राजनैतिक व सामाजिक टकराव की नौबत आ सकती है।
भारत के समक्ष चुनौतियां गंभीर है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी और सार्वजनिक सेवाओं के मोर्चे पर सरकारें एकदम नाकाम रही हैं। उच्च शिक्षा क्षेत्र इतना महंगा कर दिया गया है कि अब आम भारतीय परिवार बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के बारे में सोच भी नहीं सकता। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि आने वाले वक्त में भारत के गरीब तबके की तस्वीर कैसी होगी। यह सोच कर खुश हुआ जा सकता है कि हम दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने की ओेर अग्रसर हैं, फ्रांस को पछाड़ चुके हैं और ब्रिटेन को पीछे छोड़ने वाले हैं, लेकिन इसके स्याह पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समावेशी विकास हो या फिर मानव पूंजी सूचकांक, भारत अपने छोटे पड़ोसी देशों से भी पीछे है। दरअसल भारत अब अमीरों की मुट्ठी में है। नीतियां अमीरों के लिए ही बन रही हैं और इनका असर भी साफ नजर आ रहा है। कर्ज पीकर मौज करने वालों की संख्या में इजाफा भी अमीरों की संख्या को बढ़ाता है। ऐसे में गरीबों की तादाद तो बढ़ेगी ही, लेकिन उनकी संपत्ति और ताकत घटेगी। बढ़ती असमानता से उपजी चिंताओं के बीच देश में करोड़पतियों की तादाद का तेजी से बढ़ना खुश होने का नहीं, बल्कि गंभीर चिन्ता का विषय है। गरीबी अमीरी की बढ़ती खाई को पाटकर ही हम देश की अस्मिता एवं अखण्डता को बचा सकते हैं।
   इस तरह जब हम देश के सामाजिक और आर्थिक विकास पर नजर डालते हैं तो बड़ी भयानक तस्वीर सामने आती है। आबादी तेजी से बढ़ रही है। महंगाई भी तेजी से बढ़ी है। इन दोनों कारणों से गरीबी भी बढ़ रही है। आज भी देश की आधी से अधिक आबादी को भोजन-वस्त्र के अलावा पानी, बिजली, चिकित्सा सेवा और आवास की न्यूनतम आवश्यकताएं भी उपलब्ध नहीं है। सवाल इस बात का है कि क्या आर्थिक विकास की वर्तमान प्रक्रिया से यह तस्वीर बदल सकती है? हमारी वर्तमान विकास की नीति का लक्ष्य और दर्शन क्या है? देश की पच्चीस फीसदी आबादी शहरों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों का भी संपन्न वर्ग शहरी क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। यदि हमारी कोई व्यवस्था है तो वह इन्हीं लोगों से बनी हुई है। इसका दर्शन शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग का दर्शन है। इसका लक्ष्य है कि जितना भी हमारे पास है, उससे अधिक हो, अमीर और ज्यादा अमीर हो।
        सारी राजनीति, सारी शिक्षा, सारे विशेषाधिकार शहरी आबादी या कुछ खास धनाढ्य परिवारों तक सीमित हैं। इनमें पूंजीपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों, कारपोरेट प्रबंधकों, सरकारी नौकरशाहों, नेताओं आदि उच्च स्तर के लोगों को गिना जाता है। गैर कानूनी आय और काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था से जुड़ी आबादी भी इनमें शामिल है। इसी कारण बहुत से लोग बेरोजगार हैं या रोजगार की तलाश में हैं। आम जन-जीवन भयभीत करता है। जैसे भय केवल मृत्यु में ही नहीं, जीवन में भी है। ठीक उसी प्रकार भय केवल गरीबी में ही नहीं, अमीरी में भी है। यह भय है आतंक मचाने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से जहां है वहां से नीचे उतर जाने का, प्रियजनों की सुरक्षा का। जब चारों तरफ अच्छे की उम्मीद नजर नहीं आती, तब मनुष्य नैतिकता की ओर मुड़ता है तब भय शक्ति देता है। कारण, उस समय सभी कुछ दांव पर होता है।
गरीबी भी शक्ति होती है, भय भी शक्ति होता है। कायरता में से ही साहस पैदा होता है। हर व्यक्ति में अभी तक इतनी सोच नहीं बन सकी। लेकिन हमारे कदम तो उस ओर बढ़ें। गरीबी की रेखाओं के आर-पार जाने के लिए दरवाजे बनाने के लिए। शर्म की रेखा को तोड़ने के लिए। शर्मी और बेशर्मी दोनों मिटें। गरीबी का संबोधन मिटे। तब हम सूर्योदय के नजदीक होंगे।

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अन्नी अमृता के वॉल से
ये सच है बिल्कुल सच है कि डाॅक्टर प्रभात ने सत्य के लिए जान दे दी पर झूठ का सहारा नहीं लिया।हम तो कहते हैं पर वह तो जान पर खेल गए।ये संयोग कितना प्यारा है कि आज डाॅक्टर्स डे पर ही डाॅ प्रभात का जन्म दिन होता है।यानि इन्हें डाॅक्टर ही बनना था ।एक लडाकू इंसान जो टीएमएच की इमरजेंसी के हेड के बतौर कुछ ऐसे केस का गवाह बन बैठा जिसकी गवाही कोर्ट में देने पर कईयों की पोल खुल जाती।जी हां जमशेदपुर के चर्चित ट्रेनी एयर होस्टेस मौसमी चौधरी हत्याकांड के बारे में अगर कोई सबसे पहला गवाह बनता जो सचाई ला सकता था तो वह डाॅ प्रभात ही थे क्योंकि मौसमी आपत्तिजनक और संदिग्ध हालत में टीएमएच लाई गई थी जिसका इमर्जेंसी में दाखिला लेने से डाॅ प्रभात ने इंकार कर दिया था और अपनी बात पर अंत तक अडे रहे, क्योंकि डाॅ प्रभात कभी भी लाश का दाखिला नहीं करते थे।

    खैर पूरा शहर जानता है कि कैसे एक लडकी की हत्या की मौत को छुपाने के लिए शहर में ताबडतोड हत्याएं और आपराधिक वारदात हुए। डाॅ प्रभात को मारनेवाले एक शूटर जावेद की गुमशुदगी की अलग जांच चलती है।एक आरोपी रंजन भट्टाचार्य के लापता होने की सीबीआई जांच चल रही है।यानि एक ही मामले से जुडे होने के बावजूद सभी मामलों के अलग अलग जांच करने की नौटंकी चल रही है।

    पर ईश्वर है धीरे धीरे ईश्वर की ही अदालत में न्याय हो रहा है।गलत करनेवाले लोगों को इसी जन्म में सजा मिल रही है लेकिन डाॅ प्रभात की हत्या करने वाला मुख्य शूटर आजाद है।सुपारी देनेवाले लोग भी पकड में नहीं आए।लेकिन एक प्रमुख व्यक्ति मारा गया जो मुख्य शूटर का बेल कराया था।

    आप याद आते हैं डाॅ प्रभात और हिम्मत भी देते हैं।आपका यूं चले जाना यूं ही नहीं था आपने सच का साथ दिया था।जाने से पहले आप मुझे सावधान करते रहे पर कभी अपनी तकलीफ न बताई।आप बता देते अंकल पर आपने नहीं बताया क्योंकि आप मुझमें भी वही लडने भिडने का स्वभाव देख रहे थे और मेरी सुरक्षा को लेकर चितिंत होकर मुझे डांटते थे।तब मुझे एहसास तक नहीं था कि आप अपने भीतर कितनी तकलीफ लेकर चल रहे हैं।लेकिन आप जैसा बहादुर इस दुनिया में कोई नहीं।मैं आपको पहले भी सलाम करती थी और आज भी करती हूं।दुनिया के लिए आपका शरीर हम सबके बीच विद्यमान नहीं पर आप हमारे साथ हैं पल पल ।।।।।।आप उन सबके प्रेरणास्रोत हैं जो इस सिस्टम में न्याय की लडाई लड रहे हैं।

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पुण्य प्रसून बाजपेयी

दूसरी में पढ़ने वाले प्रघुम्न की हत्या 11वीं के छात्र ने कर दी। और हत्या भी स्कूल में ही हुई। प्रद्युम्न पढ़ने में तेज था। हत्या का आरोपी 11वीं का छात्र पढ़ने में कमजोर था। परीक्षा से डरता था। यानी हत्या की वजह भी वजह भी स्कूल में परीक्षा का दवाब ही बन गया। तो कौन सी शिक्षा स्कूल दे रहे हैं। और कौन सा वातावरण हम बच्चों को दे पा रहे हैं। ये दोनों सवाल डराने वाले हैं। पर सरकारी गीत है स्कूल चले हम..इस गीत के आसरे 99 फीसदी बच्चों का इनरॉलमेंट स्कूल में हो तो गया। क्योंकि सर्वशिक्षा अभियान देश में चला। 27 हजार करोड़ का बजट बनाया गया। पर सरकारी सच यही है कि दसवीं तक पढ़ते पढ़ते देश के 47.4 फीसदी बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। इनमें 19.8 फीसदी पांचवीं तक में तो 36.8 फीसदी आठवीं तक पढाई पूरी नहीं कर पाते और बच्चों के लिये पढाई के इस वातावरण का अनूठा सच यही है कि एक तरफ बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर सरकारी स्कूलो में 11 करोड़ बच्चे जाते हैं। तो मोटी फीस देकर 7 करोड बच्चे निजी स्कूल जाते हैं।सरकार का शिक्षा बजट 46,356 करोड़ है। निजी स्कूलो का बजट 8 लाख करोड़ का है। यानी जिस समाज को शिक्षा के आसरे अपने पैरो पर खड़े होना है उसके भीतर का सच यही है कि बच्चे देश का भविष्य नहीं होते बल्कि बच्चे वर्तमान में कमाई का जरिया होते हैं। और मुनाफे के लिये भागते दौटते देश में बच्चे कैसे या तो पीछे छूट जाते हैं या फिर बच्चो को पढाने के लिये मां बाप बच्चों से देश ही छुड़वा देते हैं। जरा ये भी समझ लें। क्योंकि अनूठा सच है ये कि देश के 5 लाख 53 हजार बच्चे इस बरस देश छोड कर विदेशों में पढने चले गये। और उनके मां बाप इन बच्चो की पढाई के लिये 1 लाख 20 हजार करोड सिर्फ फीस देते हैं। जबकि देश में उच्च शिक्षा के नाम पर मौजूदा वक्त में 3 करोड 42 लाख 11 हजार बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। और उनके लिये सरकार का कुल बजट है 33 हजार 329 करोड है। यानी सरकार उच्च सिक्षा के लिये एक बच्चे पर 974 रुपये सालाना खर्च करती है। पर विदेश जाकर पढने वाले एक बच्चे पर औसतन 2,16,958 रुपये सालाना खर्च मां बाप का जेब से होता है। तो देश का भविष्य कैसे गढ़ा जा रहा है। या फिर किस तरीके से देश के भविष्य की पौध को हम कैसे तैयार कर रहे हैं, उसके भीतर झांककर क्या कोई देखना चाहता है या फिर सत्ता को भी विदेश लुभाने लगा है। क्योंकि फिलिपिन्स में प्रधानमंत्री मोदी वहां रह रहे नागरिकों से रुबरु हुये तो देश के मुनाफे का ही जिक्र किया। मसलन " यूपीए में जिक्र होता था कितना गया। अब जिक्र होता है कितना आया।"

    यानी चाहे अनचाहे समूचा समाज ही मुनाफा पाने और कमाने की होड़ में है तो फिर जो बच्चे देश छोडकर विदेश जा रहे है वह भारत लौटेंगे क्यों। और एनआरआई होकर भारत की तरफ देखने का मतलब होगा क्या । क्योंकि आज की तारीख में 1,78,35,419 भारतीय दुनिया के अलग अलग हिस्सो में हैं। 1,30,08,407 एनआरआई हैं। यानी कुल 3 करोड से ज्यादा भारतीय देश छोड चुके हैं। तो फिर कौन सा देश हम तैयार कर रहे हैं। और बीते 5 बरस का अनूठा सच ये भी है कि 90 फीसदी अप्रवासी भारतीय वापस लौटते नहीं हैं। तो क्या पढ़े लिखों के लिये या पैसे वालो के लिये देशप्रेम का पाठ देश छोडकर विदेश चले जाना है । तो क्या देश वाकई बच्चों के लायक बच नहीं रहा । ये सवाल जहन में आना तो चाहिये । क्योंकि शिक्षा भी तो तभी होगी जब जिन्दा रहेगें । कह सकते है सवा सौ करोड़ के देश में अगर लाखों बच्चों की मौत हो भी जाती है तो क्या हुआ। लाखों बच्चे फिर पैदा हो जायेंगे। यकीन जानिये यही हो रहा है । क्योंकि हर बरस देश में जन्मते ही 7लाख 30 हजार बच्चों की मौत हो जाती है । 10 लाख 50 हजार बच्चे एक बरस भी जी नहीं पाते और सिर्फ प्रदूषण से हर बरस औसतन 2 लाख 91 हजार 288 बच्चों की मौत हो जाती है । तो दोष कहा कहा किस किस को दिया जाये। मसलन दिल्ली में प्रदूषण कम नही हुआ बल्कि दिल्ली वाले अभ्यस्त हो गये। सरकार हांफने लगी। अदालतें बेजुबा हो गई एनजीटी की कोई सुनता नहीं। प्रदूषण और दो जून की रोटी आपस में ऐसी टकरायी कि जहरीली धुंध का असर कम नहीं हुआ अलबत्ता पढ़ाई का बोझ जान की कीमत पर भारी पड गया । और अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं, और मां-बाप उन्हें स्कूल भेज रहे हैं।यानी बच्चों को भले सांस लेने में परेशानी हो रही है-आँखों से पानी आ रहा है लेकिन स्कूल खोल दिए गए हैं तो बच्चों के लिए जाना जरुरी है। तो आज बाल दिवस पर कोई तो ये सवाल पूछ ही सकता है । संविधान में दिए जीने के अधिकार का सवाल क्या बच्चों पर लागू नहीं होता । क्योंकि दिल्ली की हवा में 50 सिगरेट का धुआ है ।

    यानी दिल्ली के बच्चे हर दिन 50 सिगरेट पी रहे है । सिगरेट के पैकेट पर लिखा है जानलेवा है . बर दिल्ली की हवा जानलेवा है ये कोई खुल कर क्यो नहीं कहता । वैसे,सवाल सिर्फ दिल्ली-एनसीआर का नहीं है। पूरे देश का है। आलम ये कि पर्यावरण इंडेक्स में भारत 178 देशों में 155वां स्थान पर हैं। तो फिक्र किसे है बच्चों की । या कहे जिन्दगी की । क्योकि आजादी के वक्त चाहे सुनहरे भविष्य के सपने संजोये गये । पर आजादी के 70 बरस बाद का अनूठा सच यही है । देश के सभी बच्चो को स्कूल-स्वास्थय और पीने का साफ पानी देने में भी हम सक्षम हो नहीं पाये है । और असर इसी का है कि 14 बरस की उम्र तक पहुंचते पहुंचते 4,31,560 बच्चो की मौत हर बरस होती है । देश की राजधानी में एक तरफ प्रदूषण के बीच बच्चो को स्कूल भेजने के लिये मां बाप मजबूर है तो दूसरी तरफ दिल्ली में 13 लाख बच्चे स्कूल जाते ही नहीं है ।17 लाख बच्चे बिना इजाजत चल रहे स्कूलों में जाते हैं। यानी जब दिल्ली में ही 75 लाख बच्चो में से 30 लाख बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। या क्यों पढ नहीं रहे हैं जब इससे ही ससंद सरकार बेफिक्र है तो फिर कौन सी दिल्ली कौन से देश को रच रही है ये भी सवाल ही है।

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पुण्य प्रसून बाजपेयी

2008 से 2017 तक। यानी लिंचेस्टाइन बैंक के पेपर से लेकर पैराडाइज पेपर तक।इस दौर में पिछले बरस पनामा पेपर और बहमास लीक्स। 2015 में स्विस लीक्स। 2014 में लक्जमबर्ग लीक्स। 2013 में आफसोर लीक्स। 2011 में एचएसबीसी पेपर। 2010 में विकिलीक्स। और 2008 में लिंचिस्टाइन पेपर। यानी क्या मनमोहन का दौर या क्या मौजूदा दौर। किसी का नाम आजतक सामने आया नहीं कि कौन सा रईस टैक्स चोरी कर दुनिया में कहां कहां कितना पैसा छुपाये हुये है। या फिर ये भी पता नही चला कि जिनके नाम 2008 से लेकर 2017 तक लीक्स में निकल कर आये उनपर कार्रवाई क्या हुई। क्योंकि मंगलवार को भी वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यही कहा कि पनामा पेपर की जांच हो रही है। इनकम टैक्स नोटिस भेज रहा है। कार्रवाई या कहें जांच जारी है। तो अरुण जेटली गलत नहीं कह रहे हैं। बकायदा 450 लोगो को नोटिस दिया गया। और जांच सीबीडीटी कर रही है यानी इनक्म टैक्स विभाग ही तय कर रहा है लीक्स में आये नामो के खिलाफ कौन सी जांच हो।

       यानी दुनियाभर में जब अदालतों के जरीये जांच हो रही हैं और अदालती जांच के बाद ही पाकिस्तान में नवाज शरीफ की कुर्सी चली गई, तब हमारे सरकारी विभाग अगर जांच कर रहे हैं तो समझना होगा द बोस्टन कंसल्टिंग के मुताबिक दुनिया में आफ शोर के करीब 10 हजार अरब डालर मौजूद हैं। और दुनिया के जिन लोगो का ये पैसा आफ शोर में है, वह उनकी हैसियत सत्ता चलाने वाले की है। मसलन राजनेता। सेलिब्रिटी। कारपोरेट ज्इट्स। कारोबारी। और तमाम जमा संपत्ति की 80 फिसदी जिनके पास है वह सिर्फ 0 .1 फीसदी है। और इस 0 .1 फिसदी के भी एक फीसदी अमीरों के पास इस 80 फिसदी का 50 फिसदी धन है। तो ऐसा भी नहीं है कि भारत में जिन लोगों के नाम लिंचेस्टाइन से लेकर पैराडाइज पेपर तक में आये होंगे, वह सिर्फ रईस होंगे। बल्कि उनकी रईसी दुनिया के उन्हीं सत्ताधारियों की तरह होगी जो हमेशा राज करते है चाहे सत्ता किसी की भी रहे। ऐसे में कालधन पर नकेल कसने का सच यही है। देश की पांच सुप्रीम जांच एजेंसी सीबीडीटी, सेबी, ईडी, आरबीआई और एफईयू यानी फाइनेंशियल इंटेलिजेन्स यूनिट पैराडाइज पेपर्स लीक में आये 714 भारतीयों के खाते संपत्ति की जांच करेगी। और उससे पहले पनामा पेपर्स में आये तकरीबन 500 भारतीय के नामो की जांच इनकम टैक्स कर रहा है। जबकि 2011 में एचएसबीसी पेपर लीक में आये 1100 भारतीयों की जांच पूरी हो हो चुकी है। जिसकी जानकारी वित्त मंत्री ने इसी बरस 21 मार्च में दी । तो जांच पूरी हुई पर निकला क्या ये कोई नहीं जानता। यानी दोषी कौन। नाम किस किस के। किसका कितना धन । यकीनन कोई नहीं जानता क्योंकि सारा कच्चा चिट्टा तो सरकार के ही पास है। ठीक उसी तरह जैसे कभी मनमोहन रकार के पास होता था और 2014 में कालेधन को लेकर ही बीजेपी इस अंदाज में यूपीए पर हमला करती थी कि सत्ता में आते ही वह सारे नाम सार्वजनिक कर देगी।

      तो क्या चार बरस पहले का कालेधन को लेकर हंगामा सिर्फ चुनावी शोर था। या हर सरकार की तरह मौजूदा वक्त भी है। क्योंकि सच यह है कि कालेधन पर सरकार बनते ही एसआईटी बनाने के अलावा सरकार की हर उपलब्धि पर विरोधी निशाना साधते हैं क्योंकि नतीजा कुछ नहीं है। नोटबंदी से कितना कालाधन वापस आया-कोई नहीं बता पाया। उल्टा कहीं कालाधन धारकों ने कालाधन सफेद तो नहीं कर लिया-इसकी आशंका बरकरार है। कालाधन घोषित करने की दो सरकारी योजनाओं से सरकार को महज 69,357 करोड़ की रकम मिली-जो उम्मीद से खासी कम है। तो ऐसे में क्या याद करें कि बीजेपी ने 2014 चुनाव के वक्त 100 दिन के भीतर कालाधन वापस लाने का दावा किया था-लेकिन ऐसा हुआ नहीं। और फिर कालाधन के खिलाफ लड़ाई को विदेश के बजाय देश में सीमित कर दिया गया-जिसकी परिणिति नोटबंदी के रुप में दिखी। जबकि सच ये भी है कि 2014 से पहले कालाधन के खिलाफ लडाई का मतलब विदेशों में जमा कालाधन ही था। क्योंकि हर शख्स का आकलन विदेशों में जमाकालाधन ही था-जिसके आसरे देश की अर्थव्यवस्था को सुधारा जा सकता था। याद कीजिये सुब्रहणयम स्वामी कहते थे 120 लाख करोड। बाबा रामदेव कहते थे 400 लाख करोड। सीताराम येचुरी कहते थे 10 लाख करोड़। अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते थे 100 लाख करोड कालाधनहै। फिर अब इस कालेधन का जिक्र क्यों नहीं होता। यूं जिक्र तो सरकारी संस्थान भी किया करते थे। सीबीआई ने 29.5 लाख करोड बताया। तो एसोचैम ने ट्रिलियम डॉलर बताया। मनमोहन सिंह ही 23374 करोड़ का जिक्र करते थे। और स्व्जिजरलैंड का केन्द्रीय बैक 14,000 करोड के कालाधन के होने का जिक्र करता रहा । पर वक्त के साथ हर आकलन धरा का धरा रह गया । तो सवाल दो है । पहला, क्या कालाधन पर सारी कवायदें बेमानी हैं? दूसरा, क्या कालाधन पर लगाम लगाना संभव ही नहीं, और यह मुद्दा महज राजनीतिक मुद्दा भर है? तो ऐसे में अब नोटबंदी के दिन को ही सरकार कालाधन विरोधी दिवस या विपक्ष काला दिवस मनाती है तो इसका कोई मतलब नहीं है। और पैराडाइज पेपर्स ही नहीं बल्कि किसी भी पेपर लीक्स में किसाका नाम है । किसको सजा हई ये देश
के नागरिक जान पायेगें इसकी उम्मीद भी बेमानी है।

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डॉक्टर कल्याणी कबीर 
मुस्लिम समुदाय की औरतों को तीन तलाक से मिली आजादी ने उन्हें पुरूषों के समकक्ष खड़े होकर जीने का हौसला तो दिया ही है साथ ही उनके आत्मसम्मान की दरकती दरारों को भरने का काम भी किया है ।इस सामाजिक बुराई का अंत होना बेशक इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में हमारा समाज आगे बढ़ रहा है । इस सामाजिक कुरीति के चंगुल में फँस कर कई औरतों की जिंदगी दोजख बन गई पर इस शिकंजे से छूटने की कोशिश या यूँ कहें जोखिम उठाने की कोशिश किसी ने न की । ऐसा नहीं कि सिर्फ अशिक्षित या अल्पशिक्षित महिलाएँ ही इस कुप्रथा का शिकार हुई है । पढी - लिखी और शिक्षित महिलाओं ने भी इस दर्द और अपमान को महसूसा है पर शायद इस आँधी से लड़ने की चिंगारी भी यहीं से शुरू हुई है । कदाचित पुरूष वर्ग के झूठे अहम् की तुष्टि के लिए जरूरी है कि औरतें शिक्षा और जागरूकता की रौशनी से दूर रहें पर यह खुशी की दस्तक है कि अब महिलाओं को अपने वजूद की चिंता होने लगी है । उसे अपने और अपने बच्चों के भविष्य की फिक्र होने लगी जो तीन तलाक जैसी कुप्रथा के कारण उनके सामने सर उठाने लगी थी ।
कहते हैं ना कि रात कितनी भी गहरी हो सवेरा नहीं रोक सकती ।सबसे पहले शाहबानो नाम की महिला ने इस बुराई के खिलाफ आवाज उठाई । पहले कदम को पहला और अकेला होने की सजा भुगतनी पड़ती है । काफी चक्कर काटने पड़े शाहबानो को अपने सम्मान के लिए ।
पर अपने वजूद की चिंता करता ये काफिला थमा नहीं, आगे बढ़ता गया । सायरा , आफरीन रहमान , इशरत जहां , गुलशन परवीन, और आलिया साबरी जैसे कई नाम है जो तीन तलाक के खात्मे के लिए खुलकर आगे आईं .
पत्रिका के अप्रैल अंक में मैंने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा था कि ये मूल्क जहाँ पशुओं की भी पूजा करने की परंपरा है वहाँ मुस्लिम समुदाय की महिलाओं की जिंदगी तीन तलाक का शिकार होकर पशुवत हो जाती हैं । मुस्लिम पर्सनल लॉ के बहाने की आड़ लेकर कुछ लोग इस अमानवीय रिवाज को जीवित रखना चाहते हैं ।यह औरतों के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है । भ्रूणहत्या के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग तीन तलाक का प्रयोग कर जीती जागती महिला के जीवन को और साथ ही उसके बच्चों के भविष्य को भी अंधकारमय बना देते हैं । यह परंपरा कतई किसी सभ्य समाज की निशानी नहीं है । पर , -—
कौन बदन से आगे देखे औरत को ,
सबकी आँखें गिरवी हैं इस नगरी में

हमें विश्वगुरु भारत के स्वपन को साकार करना है तो प्रगतिशील विचारों का पोषक बनना होगा । औरत कि अस्मिता और सम्मान को मंच देना होगा . आधी आबादी के हक को दरकिनार कर हम विश्व के नक्शे पर अपनी दमदार दस्तक नहीं दे सकते हैं .

मजहब की बात नहीं बल्कि मनुष्यता की बात करें तो परिवार की गाड़ी पुरुष और महिला दोनों के संयुक्त प्रयास से ही चलती है . विचारणीय है ये प्रश्न कि घर को बचाए रखने का जिम्मा और बच्चों के भविष्य की सुरक्षा की बात क्या सिर्फ एक माँ के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए, क्या पिता के लिए इस प्रश्न से ज्यादा अहमियत रखता है तीन तलाक जैसी बुराई से फायदे लेना और कभी भी संबंध विच्छेद करने का निर्णय ले बैठना . सबंधों की ज़मीं समतल नहीं होती . उतार चढ़ाव इस ज़मीं के मौसम होते हैं . ऐसे में बात छोटी हो या बड़ी सबंध तोड़ने का निर्णय लेना परिवार नाम की संस्था की जड़ें खोखली कर सकता है . देश का भविष्य , हमारे बच्चे घर में ही मानसिक और शारीरिक विकास कर पाते हैं . टूटते घरों के बच्चे से हम शायद ही ये उम्मीद कर पाएँ . और जिन बच्चों को हम भावनात्मक सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं उनसे समाज और देश के लिए कुछ अच्छे की उम्मीद करना बेमानी है .फिर मजहब की आड़ में इस कुप्रथा को ढोने की क्या जरुरत है . कुरान में भी तीन तलाक जैसे किसी परंपरा का ज़िक्र नहीं है . इस प्रथा को खत्म करने के लिए बस ये वजह ही काफी है . धर्म से जुड़ा मसला बताकर तीन तलाक का पक्ष लेने वाले लोग वो हैं जो पुरुष प्रधान समाज का मुखिया बने रहने का नज़रिया रखते हैं और जिनकी नज़र में औरत एक सामान है जिसे कभी भी बदला जा सकता है — वजह - बेवजह ! अब जरुरी है कि स्त्री - हित की सोचते हुए सभी राजनीतिक दल इस दिशा में गंभीरता से सोचें और कानून का निर्माण करें . तीन तलाक को बैन करने से हलाला जैसी बेतुकी प्रथा भी खुद ब खुद समाप्त हो जायेगी . पर यहाँ यह बात भी ध्यान रखने की है कि किसी भी बुराई को खत्म करने के लिए समाज को जागना होगा . समाज के प्रबुद्ध वर्ग को सामने आना होगा . हर बुराई का अंत कानून से ही नहीं हो सकता . समाज का निर्माण मनुष्य से होता है . इसलिए मनुष्यता को ज़िंदा रखना और मर्द और औरत को एक समान समझने की समझदारी रखना हमारा काम है . बदलाव कि एक साफ हवा , शुद्ध सोच का होना जरुरी है . मुस्लिम औरतों के ह़क के लिए ही नहीं बल्कि पूरे मुस्लिम समाज के लिए जरुरी है कि ऐसे मसलों पर कोडिफाइड मुस्लिम लॉ बने . न्यायपालिका ने तो अपनी समदृष्टि का परिचय देते हुए औरतों के ह़क में फैसला दे दिया है पर इसे कानून में ढलने का काम न्यायपालिका का नहीं बल्कि संसद का है . बेशक न्यायपालिका के फैसले से हमारी हिम्मत बढ़ी है . औरतें तो सिर्फ औरतें होती हैं उनका दर्द एक औरत का दर्द होता है . कोई धर्म - संप्रदाय - जाति इन्हें अलग - अलग नहीं करती . इस फैसले से सिर्फ मुस्लिम समुदाय की औरतें ही नहीं बल्कि भारत देश की हर औरत ने सुकून महसूस किया होगा . यह निर्णय एक औरत के वजूद के लड़ाई की जीत है , जीत है उसके सम्मान की , उसके मुस्कराहट की , उसके हौसले की .

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पुण्य प्रसून बाजपेयी

यादें बेहद धूमिल है...कैसे जिक्र सिर्फ इंदिरा गांधी का होता था। कैसे नेताओं की गिरप्तारी की जानकारी अखबारों से नहीं लोगो की आपसी बातचीत से पता चलती थी । कैसे दफ्तरो के बाबू टाइम पर आने लगे थे । बसें वक्त पर चल रही थी । रेलगाडियां लेट नहीं हो रही थी । स्कूलो में टीचर भी क्लास में वक्त पर पहुंचते। जिन्दगी अपनी रफ्तार से हर किसी की चल रही थी । फिर इमरजेन्सी का मतलब या खौफजदा होने की वजह क्या है. ये सवाल उस दौर में हमेशा मेरे जहन में बना रहा। यादें धूमिल हैं लेकिन याद तो आता है कि गाहे-बगाहे कभी छुट्टी के दिन घर में पिता जी के मित्रों की चर्चा का जमावडा होता तो जिक्र इमरजेन्सी या इंदिरा गांधी के साथ साथ जेपी का भी होता । पांचवी-छठी क्लास में पढने के उस दौर की यादे सहेज कर रखना मेरे लिये इसलिये आसान था क्योंकि पिताजी का तबादला दिल्ली से बिहार होने की वजह इमरजेन्सी का लगना और जेपी के बिहार में होना ही था। और इसका जिक्र इतनी बार घर में हुआ कि मैं शुरु में सिर्फ इतना ही जान पाया कि1975 में दिल्ली छूट रहा है और रांची जा रहे हैं तो वजह इमरजेन्सी है ।

खैर ये अलग यादें हैं कि उस वक्त रेडियो का बुलेटिन ही कितना महत्वपूर्ण होता था ...और कैसे रांची में शाम 6 बजकर बीस मिनट का प्रादेशिक बुलेटिन शुरु करने के बाद पटना में साढ़े सात बजे के बुलेटिन के लिये पिताजी को जाना पड़ा और पूरा परिवार ही इमरजेन्सी में दिल्ली से रांची फिर पटना घूमता रहा । लेकिन आज संदर्भ इसलिये याद आ रहा है क्योंकि बीते कई महीनों से मुझे बार बार लग रहा है कि जो भी पढ़ाई की, या जिस वातावरण को जीते हुये हम स्कूल-कॉलेज से होते हुये पत्रकारिता के दौर को जीते हुये चर्चा करते रहे ...सबकुछ अचानक गायब हो गया है । पटना के बीएन कालेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ते-पढ़ते हम कई मित्र छात्र देश के संविधान को ही नये सिरे से लिखने की बात तक करते । बकायदा जीने के अधिकार का जिक्र कर कैसे उसे लागू किया जाना चाहिये चर्चा बाखूबी होती । हिन्दी के शिक्षक गांधी मैदान के किनारे एलीफिस्टन सिनेमा हाल के मुहाने पर चाय की दुकान में नीबू की चाय की चुस्कियों में बता देते कि वसंत का मौसम हम युवाओं को जीने नहीं देता क्योंकि सारी परीक्षा वसंत में ही होती है । पटना साइंस कालेज के फिसड्डी छात्रों में होने के बावजूद जातिय राजनीति का ज्ञान पटना यूनिवर्सिटी में एक के बाद एक कर कई हत्याओं ने 1983 में ही समझा दिया था । और नागपुर में पत्रकारिता करते हुये दलित -संघ - नक्सलवाद को बाखूबी समझने के लिये उस वातावरण को जीया । यानी पत्रकारिता के आयाम या कहे उसका कैनवास इतनी विस्तृत था कि किसी खाके में किसी ने 1989 से 1995 तक बांटने की या कहे रखने की कोशिश नहीं की । जबकि उस वक्त के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के साथ सैकड़ों बार बैठना हुआ । उस वक्त दलित राजनीति के केन्द्र में नागपुर के रिपब्लिकन नेताओं के साथ कई कई दिन गुजारे। म्हारों की बस्ती में जा कर रहा । उनके बीच से दलित रंगभूमि को खड़ा किया । तब के नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रूप के सर्वेसर्वा सीतारमैया से तेलगांना के जंगलों में जा कर मुलाकात की । और नागपुर में रहते हुये पत्रकारिता का एैसा अंदाज था कि क्या मुंब्ई क्या दिल्ली या क्या लंदन । देश दुनिया से कोई भी पत्रकार या रिसर्च स्कॉलर नागपुर पहुंचा तो या तो वह हमारी चौखट पर जानकारी के लिये या फिर हम जानकारी हासिल करने के लिये उसकी चौखट पर। याद नहीं आता इंदिरा गांधी के इमरजेन्सी के दौर को छोडकर कभी कोई प्रधानमंत्री बहस - चर्चा में आया । जेएनयू में रहते हुये मुनिस रजा तो शैक्सपियर और किट्स के जरीये क्लासिकल अंग्रेजी साहित्य को छात्रों के साथ शाम में घूमते-टहलते हुये बकायदा जीते । छात्र भी जीते । आगवानी साहेब तो जेएनयू की खूबसूरती तले पर्यावरण का जिक्र अक्सर करते । यूं हाल में रहे बीबी भट्टाचार्य भी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल इक्नामी पर चर्चा कर सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं का जिक्र नई नई किताब या किसी रिसर्च पेपर के बताकर करते । फणीश्वरनाथ रेणु की दिनमान की पत्रकारिता । अज्ञेय का पेड़ पर घर बनाकर रहना । और उनकी मुश्किल हिन्दी । मुक्तीबोध के चांद के मुंह ढेडा । या फिर पाश का सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना । या फिर प्रेमचंद की ही दलित पत्रकारिता को लेकर बहस । कह सकते है सवाल और समझ जितने दायरे में घूमते रहे उस दायरे में गुरुदत की प्यासा भी रेंगी और घडकन बढाने वाली "ब्लेम इट आन रियो" भी मधुबाला की खूबसूरती से लेकर वहीदा का अंदाज और डिंपल का जादू भी चर्चा में शरीक रहा । रेखा-अमिताभ की जोड़ी के रोमानीपन तले विवाह के बंधन पर चर्चा हुई । मीना-कुमारी के इश्क और शराब में भी गोते लगाये । लेकिन कभी कुछ ठहरा नहीं । स्कूल कालेज या पत्रकारिता करते हुये समाज के हर क्षेत्र में घुमावड़ा। थमा कुछ भी नहीं। अंडरवर्ल्ड को जानने समझते बंबई भी पहंचे। भाई ठाकुर से भी मिले । उसके ज्ञान पर रश्क भी हुआ। और 1989 में शिवसेना की सामना के शुरुआत वाले दिन पत्रकारों की टोली के साथ गोवा से लौटते हुये बंबई में बालासाहेब ठाकरे से मुलाकात के मोह में रुक भी गये । और ठाकरे की ठसक को छत पर बीयर के साथ तौला भी । और लौटते वक्त फैज की नज्म ...जख्म मिलता रहा ..जख्म पीते रहे ...हम भी जीते रहे...को भी बखूबी गुनगुनाया । एसपी सिंह की पत्रकारिता को सलाम करते हुये अपने ही अखबार के मालिक के खिलाफ खडे होकर एसपी को सहयोग करते रहे । प्रभाष जोशी की पत्रकारिता के अंदाज को बखूबी जीते हुये अपने जन्मदिन वाले दिन संपादकीय पन्ने पर उस लेख को छापने की मांग रख दी जो बताता था,,,क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन और 18 मार्च को बकायदा लेख छा पर प्रभाष जी का फोन लोकमत के संपादक को आया....बता देना आज छप गया है....क्यों नहीं हो पा रहा है व्यवस्था परिवर्तन...जन्मदिन की बधाई भी दे देना । और कहना कि जरा बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों पर भी लेख लिखे..नागपुर में है तो दिल्ली का कुछ भला करे। यानी चर्चा बहस हर बात को लेकर । हालात तो इतने खुले हुये कि...6 दिसबंर 1992 का बाद देश में माहौल जो भी हो..लेकिन कहीं गोली नहीं चली..कोई मरा नहीं...मगर नागपुर के मोमिनपुरा में विरोध रैली सडक पर ना आ जाये तो तबके कमीश्नर ईनामदार ने गोली चलवा दी....12 लोग मारे गये ...मरने वालो में संयोग से वह लड़का भी जो चार दिन बाद दिलीप कुमार को मुशायरे में बुलवाने के लिये आमंत्रण देकर स्वीकृति लेकर नागपुर पहुंचा था । और मुशायरा रद्द हुआ तो ...आग्रह पर दिलीप कुमार ने भी खासकर अखबार में छापने के लिये पत्र लिखा...हालात पर लिखा और शायरी के अंदाज में मुश्यरा दिलों में जगाये रखने की तमन्ना भी जाहिर की । 10 या 11 दिसंबर 1992 को दिलीप कुमार का पत्र छपा भी । नागपुर यूनिर्वसिटी के पालेटिकल साइस के प्रोफेसर राणाडे ने घर बुलाकर चाय पिलाई । चर्चा की । चर्चा तो खूब होती रही । जब राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह की इक्नामिक पालेसी पर अंगुली उठाई तब फिल्म दीवार के दृश्य ...मंदिर से निकल कर दो अलग अलग रास्तों पर जाते अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की तर्ज पर मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का जिक्र किया ...और भास्कर ने लेख छापा तो पीएमओ को अच्छा नहीं लगा । लेकिन पीएमओ का अंदाज भी चर्चा वाला ही रहा । क्या होना चाहिये ...पीएमओ बाहर से देखने में कितना अमानवीय है, इस पर भी खुल कर चर्चा की । मनमोहन सिंह के दौर में घोटाले दर घोटालों का जिक्र भी रिपोर्टो के जरीये खूब किया । कोयला से लेकर टू-जी । राडिया टेप से लेकर कलमाडी । खूब लिखा । सत्ता की एडवाइरी को भी देखा-सुना परखा । सत्ता की हेकडी को भी देखा । वाजपेयी की सादगी में मनमोहन सिंह को खोजना मूर्खता लगा। तो सत्ता की चौखट पर खडे होकर कहने से भी नहीं चूके । नागपुर से ए बी वर्धन की यारी जारी रही तो 2004 में इक्नामिस्ट मनमोहन की इक्नामिक पॉलिसी तले खडे होकर बर्धन ने जब एलान किया.....डिसइन्वेस्टमेंट को बंगाल की खाडी में डूबो देना चाहिये...फिर फोन कर पूछा ..समुद्र इतना गहरा होता कि उसमें से डिसइन्वेस्टमेंट वापस तो नहीं निकलेगा । और ठहाके के अंदाज में सत्ता को भी बिना लाल बत्ती जी लिया। यही खुलापन लगातार खोज रहा हूं..सोच रहा हूं कोई जिक्र किसी गजल का कोई क्यों नहीं कर रहा.....क्या वह आखिरी पाश था जो कलाई में बंधी खडी के कांटे को घूमते हुये ठहरा मान चुका था । आखिर साहित्य--संगीत पर देश में बात क्यों नहीं हो रही है । क्यों घर में जुटे चार दोस्त भी पकौडी-चाय पर ठहाके लगाते सुनाई दिखायी नहीं दे रहे हैं । क्यों खुफिया तरीके से कोई फोन कर बताता है ,,,बंधुवर प्रेमचंद की गोदान अब सिलेबस से बाहर कर दी गई है । क्यों मीडिया संस्धानों में जिन्दगी पर चर्चा नहीं हो पा रही है । क्यों सरकारी दफ्तरों में घुसते ही एक तरह की मुर्दानगी दिखायी दे रही है । ऐसा क्यो लग रहा है कि हर किसी ने लक्ष्य निर्धारित कर लिये है और उसे पाने में जुटा है । जैसे गुरुग्राम में सात बरस के प्रघुम्न की हत्या पर कंडक्टर को गिरफ्तार कर पुलिस सबूत जुटाने में जुटी । तो फिर देश भी चुनाव दर चुनाव जीतने के लिये माहौल बनाने के लिये ही काम करेगा । सत्ता हो या विपक्ष । और इस माहौल में जनता भी तो पहले ही तय कर रही है उसे किससे चाहिये । क्या चाहिये । देने वाले के सामने भी लक्ष्य है । और उसी आसरे वह भी तय कर रहा है किसे कितना देना है । तो फिर याद किजिये पंचतंत्र की कहा यो को । पंचतंत्र जो दुनिया के हर भाषा में अनुवादित है । और उसे दो हजार बरस पहले विष्णु शर्मा ने उस राजा के कहने पर लिखा । जिसके बच्चे बिगडे हुये थे । और वन में रह कर तपस्या कर रहे विष्णु शर्मा की तरफ भी राजा का ध्यान इसलिये गया क्योकि वह भोग-उपभोग से दूर वन में तपस्या कर रहे थे । यानी तब राजा भी जानते थे कि ज्ञान उसी के पास होगा जिसे कुछ चाहिये नहीं । यानी 2019 का लक्ष्य रखकर कौन का काम होगा और कौन सा ज्ञान किसके पास होगा । मुक्त हो कर जीने का मजा देखिये । ..जख्म मिलता रहा / जख्म पीते रहे / जख्म जब भी कोई जहन-ओ-दिल को मिला / जिन्दगी की तरफ एक दरीचा खुला / जिन्दगी हमें रोज आजमाती रही / हम भी उसे रोज आजमाते रहे....

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13 मई 2002 को एक हताश और मजबूर लड़की, डरी सहमी सी देश के प्रधानमंत्री को एक गुमनाम ख़त लिखती है। आखिर देश का आम आदमी उन्हीं की तरफ तो आस से देखता है जब वह हर जगह से हार जाता है।

निसंदेह इस पत्र की जानकारी उनके कार्यालय में तैनात तमाम वरिष्ठ नौकरशाहों को भी निश्चित ही होगी।

साध्वी ने इस खत की कापी पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों और प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को भी भेजी थी।

खैर मामले का संज्ञान लिया पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने जिसने 24 सितंबर 2002 को इस खत की सच्चाई जानने के लिए सीबीआई को डेरा सच्चा सौदा की जांच के आदेश दिए।

जांच 15 साल चली, चिठ्ठी में लगे तमाम इलजामात सही पाए गए और राम रहीम को दोषी करार दिया गया। इसमें जांच करने वाले अधिकारी और फैसला सुनाने वाले जज बधाई के पात्र हैं जिन्होंने दबावों को नजरअंदाज करते हुए सत्य का साथ दिया।

देश भर में आज राम रहीम और उसके भक्तों पर बात हो रही है लेकिन हमारी उस व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा जिसमें राम रहीम जैसों का ये कद बन जाता है कि सरकार भी उनके आगे घुटने टेकने के लिए मजबूर हो जाती है।

उस हिम्मत की बात क्यों नहीं हो रही जब ऐसे व्यक्ति से विद्रोह करने का बीड़ा एक अबला जुटाती है?  उसके द्वारा उठाए गए जोखिम की बात क्यों नहीं होती?

उस व्यवस्था के दोष की बात क्यों नहीं होती जिसमें एक  बेबस लड़की द्वारा लिखा गया एक पत्र जिसमें उन तमाम यातनाओं का खुलासा होता है जो उस जैसी अनेक साध्वियाँ भुगतने के लिए मजबूर हैं देश के बड़े से बड़े अधिकारियों के पास जाता तो है लेकिन उस पर कार्यवाही नहीं होती।

उस भावनाशून्य सिस्टम पर बात क्यों नहीं होती जिसमें  कोई भी इस पत्र में बयान की गई पीड़ा को  महसूस नहीं कर पाता है?

क्योंकि अगर इनमें से कोई भी जरा भी विचलित होता तो क्या यह राम रहीम को उसी समय सलाखों के पीछे डालने के लिए एक ठोस सबूत नहीं था?

हम उस सिस्टम को दोष क्यों नहीं देते जिसमें यही आरोप अगर किसी आम आदमी पर लगा होता तो वह न जाने किन किन धाराओं के आधार पर आधे घंटे के भीतर ही जेल में डाल दिया गया होता?

हम उस समाज में जी रहे हैं जिसमें जब 24 अक्तूबर 2002 को सिरसा से निकलने वाले एक सांध्य दैनिक  "पूरा सच" अपने अखबार में इस खत को छापता है तो उसी दिन उस पत्रकार को उसके घर के बाहर गोलियों से भून दिया जाता है और कहीं कोई आवाज नहीं उठाई जाती।

हम उस दौर से गुजर रहे हैं जिसमें इस खत की प्रतिलिपि इस मामूली अखबार के अलावा उन मीडिया घरानों के पास भी थी जिन्होंने न सिर्फ इस खत को अनदेखा किया बल्कि अपने साथी पत्रकार की हत्या पर भी तब मौन रहे लेकिन आज बाबा का चिठ्ठा खोल रहे हैं।

क्या यह हमारी न्याय व्यवस्था का मजाक नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री को पत्र लिखे जाने के पन्द्रह साल बाद तक एक आदमी कानून की खिल्ली उड़ाता रहा,सबूतों के साथ खिलवाड़ करता रहा और गवाहों की हत्या करवाता गया?

सुनवाई के दौरान न्याय मांगने वाली साधवी सिरसा से 250 किमी का सफर तय करके पंचकुला कोर्ट पहुँचती थीं और गुरमीत सिंह वीडियो कांफ्रेन्सिंग के जरिए सिरसा से ही गवाही देता था? इसके बावजूद वह आधी से अधिक गवाहियों में पेश नहीं हुआ और जब आया तो ऐसे काफिले के साथ कि जैसे हिन्दुस्तान में कोई क़ानून व्यवस्था नहीं है और देश में उसी का राज है?

प्रशासन मौन साधे खड़ा था और हम जनता को अंधभक्त कह रहे हैं?

आखिर 15 साल तक हमारा प्रशासन क्या देखता रहा या फिर देखकर भी आँखें क्यों मूंदता रहा?

इस पर भी जनता अंधभक्त है?

हुजूर जनता बेचारी क्या करे जब प्रधानमंत्री को लिखा उसका पत्र भी उसे न्याय दिलाने में उससे उसके भाई की जान और उसके जीवन के 15 साल मांग लेता है?

जनता बेचारी क्या करे जब उसके द्वारा चुनी गई सरकार के राज में उसे भूखे पेट सोना पड़ता है लेकिन ऐसे बाबाओं के आश्रम उन्हें भरपेट भोजन और नौकरी दोनों देते हैं।

जनता बेचारी क्या करे जब वह आपके बनाए समाज में अपने से ऊँचे पद प्रतिष्ठा और जाती वालों से अपमानित होते हैं लेकिन इन बाबाओं के आश्रम में उन सबको अपने बराबर पाते हैं,।

जनता बेचारी क्या करे जब वह बड़े से बड़े नेता को इनके दरबार में माथा टेकते देखती है?

साहब, जनता को तो आपने ही अपनी आँखें मूँद कर अँधा बना दिया!

जनता को इन बाबाओं की हकीकत समझाने से पहले अपने समाज की हकीकत तो समझें कि  जनता तो इन्हें केवल भगवान ही बनाती है लेकिन हमारा सिस्टम तो इन्हें शैतान बना देता है! यह बाबा अपने अनुयायियों की संख्या बनाते हैं,इस संख्या को चुनावों में हमारे नेता वोट बैंक बनाते हैं,

चुनाव जीत कर सरकार भले ही ये नेता बनाते हैं पर इस सरकार को यह बाबा चलाते हैं।

जनता की अंधभक्ती को देखने से पहले उसकी उस हताशा को महसूस कीजिए जो वह अपने नेताओं के आचरण में देखती है उसकी बेबसी को महसूस कीजिए जो वह पैसे वालों की ताकत के आगे हारते हुए महसूस करते हैं उस दर्द को समझिये जो ताकतवर लोग अपनी ताकत के बल पर उन्हें अक्सर देते रहते हैं उस असहायपन का अंदाजा लगाइए जब वे रोज अपनी आँखों के सामने कानून को चेहरों और रुतबे के साथ बदलते देखते हैं।

सोचिए कि क्यों आम लोगों का राजनीति कानून और इंसाफ से विश्वास उठ गया?

सोचिए कि क्यों इस मुकदमे में सजा सुनाने के बाद जज को सुरक्षा के मद्देनजर किसी गुमनाम जगह पर ले जाया गया?

क्या इस सब के लिए जनता दोषी हैं या फिर वो नेता जो इन बाबाओं की अनुयायी जनता को वोट बैंक से अधिक कुछ नहीं समझती तब भी जब वो इन बाबाओं के आश्रम में होती है और तब भी जब बाबा जेल में होते हैं और जनता सड़कों पर होती है।

काश कि हमारे नेता जनता के  वोट बैंक  को खरीदने के बजाये जनता के वोट कमाने की दिशा में कदम उठाना शुरू करे और धरातल पर ठोस काम करें जिस दिन हमारे देश की जनता को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करना पडेगा जिस दिन ‘देश के संविधान में सब बराबर हैं’ यह केवल क़ानून की किताबों में लिखा एक वाक्य  नहीं यथार्थ होगा उस दिन ऐसे सभी बाबाओं की दुकानें खुदबखुद बंद हो जायेंगी जनता को इन बाबाओं में नहीं हमारी सरकार और हमारे सिस्टम में भगवान दिखने लगेगा  

वो सुबह कभी तो आयेगी

डॉ नीलम महेंद्र

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धर्म मनुष्य में मानवता जगाता है,

लेकिन जब धर्म ही मानव के पशु बनने का कारण बन जाए तो दोष किसे दिया जाए धर्म को या मानव को ?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ताजा बयान का मकसद जो भी रहा हो लेकिन नतीजा अप्रत्याशित नहीं था।

कहने को भले ही हमारे देश की पहचान उसकी यही सांस्कृतिक विविधता है लेकिन जब इस विविधता को स्वीकार्यता देने की पहल की जाती है तो विरोध के स्वर कहीं और से नहीं इसी देश के भीतर से उठने लगते हैं।

जैसा कि होता आया है ,मुद्दा भले ही सांस्कृतिक था लेकिन राजनैतिक बना दिया गया।

देश की विभिन्न पार्टियों को देश के प्रति अपने  'कर्तव्यबोध' का ज्ञान हो गया और अपने अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर बयान देने की होड़  लग गई।

विभिन्न टीवी चैनल भी अपनी कर्तव्यनिष्ठा में पीछे क्यों रहते ? तो अपने अपने चैनलों पर बहस का आयोजन किया और हमारी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के प्रवक्ता भी एक से एक तर्कों के साथ उपस्थित थे।

और यह सब उस समय जब एक तरफ देश अपने 66 मासूमों की मौत के सदमे में डूबा है,तो दूसरी तरफ बिहार और आसाम के लोग बाढ़ के कहर का सामना कर रहे हैं।

कहीं मातम है, कहीं भूख है, कहीं अपनों से बिछड़ने का दुख है तो कहीं अपना सब कुछ खो जाने का दर्द।

लेकिन हमारे नेता नमाज और जन्माष्टमी में उलझे हैं।

सालों से इस देश में मानसून में कुछ इलाकों में हर साल बाढ़ आती है जिससे न सिर्फ जान और माल का नुकसान होता है बल्कि फसल की भी बरबादी होती है।

वहीं दूसरी ओर कुछ इलाके मानसून का पूरा सीज़न पानी की बूंदों के इंतजार में निकाल देते हैं और बाद में उन्हें सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है।

इन हालातों की पुनरावृत्ति न हो और नई तकनीक की सहायता से इन स्थितियों पर काबू पाने के लिए न तो कोई नेता बहस करता है न आंदोलन।

फसलों की हालत तो यह है कि अभी कुछ दिनों पहले किसानों द्वारा जो टमाटर और प्याज सड़कों पर फेंके जा रहे थे  आज वही टमाटर 100 रुपए और प्याज तीस रुपए तक पहुँच गए हैं।

क्योंकि हमारे देश में न तो भंडारण की उचित व्यवस्था है और न ही किसानों के लिए ठोस नीतियाँ। लेकिन यह विषय हमारे नेताओं को नहीं भाते।

किसान साल भर मेहनत कर के भी कर्ज में डूबा है और आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई महंगाई की भेंट चढ़ाने के लिए मजबूर।

लेकिन यह सब तो मामूली बातें हैं!

इतने बड़े देश में थोड़ी बहुत अव्यवस्था हो सकती है ।

सबसे महत्वपूर्ण विषय तो यह है कि थानों में जन्माष्टमी मनाई जानी चाहिए कि नहीं?

काँवर यात्राओं में डीजे बजना चाहिए कि नहीं?

सड़कों पर या फिर एयरपोर्ट पर नमाज पढ़ी  जाए तो उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं।

मस्जिदों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लाउड स्पीकर बजेंगे क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं के सम्मान का प्रतीक है।

मोहर्रम के जलूस को सड़कों से निकलने के लिए जगह देना इस देश के हर नागरिक का कर्तव्य है क्योंकि यह देश गंगा जमुना तहज़ीब को मानता आया है।

लेकिन कांवरियों के द्वारा रास्ते बाधित हो जाते हैं जिसके कारण जाम लग जाता है और कितने जरूरतमंद लोग समय पर अपने गन्तव्यों तक नहीं पहुंच पाते।और इस यात्रा में बजने वाले डीजे ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं।

इस तरह की बातें कौन करता है?

क्या इस देश का किसान जो साल भर अपने खेतों को आस से निहारता रहता है

या फिर वो आम आदमी जो सुबह नौकरी पर जाता है और शाम को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के धक्के खाता थका हारा घर आता है

या फिर वो व्यापारी जो अपनी पूंजी लगाकर अपनी छोटी सी दुकान से अपने परिवार का और माता पिता का पेट पालने की सोचने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाता।

या वो उद्यमी जो जानता है कि एक दिन की हड़ताल या दंगा महीने भर के लिए उसका धंधा चौपट कर देगा

या फिर वो गृहणी जो जिसकी पूरी दुनिया ही उसकी चारदीवारी है जिसे सहेजने में वो अपना पूरा जीवन लगा देती है

या फिर वो मासूम बच्चे जो गली में ढोल की आवाज सुनते ही दौड़े चले आते हैं

उन्हें तो नाचने से मतलब है धुन चाहे कोई भी हो

जब इस देश का आम आदमी केवल शांति और प्रेम से अपनी जिंदगी जीना चाहता है तो कौन हैं वो लोग जो बेमतलब की बातों पर राजनीति कर के अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं?

अब जब न्यू इंडिया बन रहा है तो उसमें  'ओल्ड'

की कोई जगह नहीं बची है। ये बातें और इस तरह की बहस पुरानी हो चुकी हैं इस बात को हमारे नेता जितनी जल्दी समझ जाए उतना अच्छा नहीं तो आज सोशल मीडिया का जमाना है और यह पब्लिक है जो सब जानती है। बाकी समझदार को इशारा काफी है

डॉ नीलम महेंद्र

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