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Editorial (16)

'राष्ट्र संवाद' की स्थापना के 19 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। दशकों से जमे 'प्रिंट मीडिया' के दिग्गजों के लिए यह बहुत मामूली और सामान्य-सी बात हो सकती है, लेकिन हमारे लिए यह बेहद गर्व का अवसर होने के साथ ही आत्मचिंतन और मीडिया की दशा-दिशा की पड़ताल करने का भी अवसर है। हमारे लिए 'राष्ट्र संवाद' का 19 साल का सफर पड़ाव-दर-पड़ाव आगे बढ़ते रहने की जद्दोजहद भरा कठिन सफर रहा है। सच में, ये 19 साल दुश्मन हवाओं के तेज थपेड़ों के बीच एक मशाल जलाए रखने का जुझारू संघर्ष रहा है।
पत्रकारिता वास्तव में मशाल जलाए रखने जैसा मुश्किल काम है। मशाल का काम अंधेरे में रास्ता दिखाना होता है। यर्थाथ के आलोक में सही रास्ता दिखना ही मीडिया का मूल उद्देश्य भी है। परन्तु कॉरपोरेट कल्चर एवं बाजार के अति प्रभावशाली हो जाने के कारण कलम भी उससे प्रभावित हो गई है। सही ढंग से कहा जाए तो कलम बाजारू हो गई है। सही को सही लिखने का साहस अब बड़े-बड़े कलमवीरों में नहीं बचा है। बड़े-बड़े संपादक सत्ता प्रतिष्ठानों की कृपा प्राप्त करने के लिए कलम से तरह-तरह की तिकड़में भिड़ाते रहते हैं। उनकी लेखनी हमेशा किसी-न-किसी का स्तुति गान ही करती रहती है। बदले में किसी को मोटे वेतन व घोड़ा-गाड़ी के साथ कहीं का सलाहकार बना दिया जाता है तो कोई-न-कोई राज्यसभा की सदस्यता हासिल कर लेता है। इन स्वनामधन्य सेलेब्रिटी पत्रकारों के प्रति विश्वास डगमगाने लगता है, लेकिन फिर इन्हीं लोगों के घटिया आचरण के कारण यह विचार और दृढ़ होता है कि पत्रकारिता को उसके आदर्शों से भटकने नहीं देना है। 'राष्ट्र संवाद' इसी दृढ़ संकल्प का परिणाम है। सत्ता के मठााधीशों के दरबार में चरणवंदना करने वालों में दशकों से स्थापित तथा कथित राष्ट्रीय मीडिया से लेकर शहर, जिला मुख्यालयों से निकलने वाले स्थानीय अखबार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक सभी शामिल हैं। अधिकांश बड़े-बड़े पत्रकारों के साथ-साथ मीडिया संस्थान किसी-न-किसी पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर काम करने में जुटे हुए हैं। किसी को सामाजिक समस्याओं व मुद्दों को लेकर किसी भी प्रकार का सरोकार नहीं है। कभी आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता जब नतमस्तक के मोड पर आ गई है तो इन परिस्थितियों में 'राष्ट्र संवाद' ने उस पुरानी अलख को जगाए रखने की पूरी कोशिश की है। बड़े-बड़े अखबारों का हाल न केवल खबरों से समझौता करने को लेकर बेहद लचीला हो गया है, वहीं पत्रकारों के शोषण के मामले में भी स्थितियां आज जगजाहिर हैं। मजठिया आयोग द्वारा तय वेतनमान के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी क्या स्थितियां बनी हुई हैं, इसे सभी जानते हैं। कोई भी ऐसा बड़ा संस्थान नहीं है, जहां मजीठिया आयोग द्वारा तय वेतनमान लागू किया गया है। बकायदा, तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर या तो कर्मचारियों को निकाला गया है या फिर उन्हें किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम से नियुक्त दिखाया गया है। हैरानी की बात यह है कि पत्रकारों को अनुशांसित वेतन न देने के तरह-तरह के हथकंडे अपनाने वाले ये अखबार ही अपने पन्नों पर खुद को सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला नंबर-वन अखबार भी घोषित करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल तो और भी बुरा है। कुछ समाचार चैनलों पर तो दिन भर कोई-न-कोई ज्योतिषाचार्य बैठा हुआ शनि से मुक्ति के उपाय बताता नजर आता है। उससे मुक्ति मिलती है तो कॉमेडी शो के फूहड़ फिल्मी मजाक का तरह-तरह के भावों के साथ पुन: प्रसारण चलता रहता है। और जब समाचारों की बारी आती है तो फटाफट 200 खबरें आने लगती हैं, जिसमें छोटी-मोटी चोरी चमारी की मामूली खबरों को भी बड़े ही सनसनीखेज ढंग से राष्ट्रीय समाचार के रूप में पेश किया जाता है। फिर चैनल अपने एजेंडे और दलीय निष्ठा के अनुसार भाषणनुमा खबरें प्रस्तुत करते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाला मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार को तिलांजलि दे चुका है और लोकतंत्र के अन्य स्तंभों पर अकुंश लगाने की अपनी भूमिका को स्वत: ही सीमित करता जा रहा है। 'राष्ट्र संवाद' अपने सीमित साधन संसाधन के बावजूद स्वतंत्र, निष्पक्ष और विवेकपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इस प्रयास में हमें अपने सुधि पाठकों, विज्ञापनदाताओं व शुभचिंतकों का भरपूर सहयोग मिला है। हम अपने पाठकों, विज्ञापनदाताओं व शुभचिंतकों को विश्वास दिलाते हैं कि 'राष्ट्र संवाद' भविष्य में भी अपनी यह भूमिका ईमानदारी के साथ निभाता रहेगा।

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चंद्रेश शर्मा(संयुक्त सम्पादक)

रांची/हजारीबाग/चतरा,14 सितम्बर:नक्सली संगठन टीपीसी में चौथे नम्बर के चीफ कोहराम उर्फ लक्ष्मण गंझू की गिरफ्तारी नाटकीय ढंग से हुई । सूत्रों की अगर माने तो गिरफ्तारी के वक्त कोहराम की पत्नी जिला परिषद अध्यक्ष ममता देवी की उपस्थिति ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है ..क्या वाकई कोहराम की गिरफ्तारी हुई या उसने आत्मसमर्पण किया ? बढ़ती पुलिसिया कार्यवाई ने जिला परिषद अध्यक्ष की साख पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया था। कहीं यह कार्यवाई ममता देवी की साख बचाने की दिशा में बड़ा कदम तो नहीं?आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पुलिसिया कार्यवाई से पूर्व ही कोहराम पिछले 2 वर्षों से पार्टी लाईन से हटकर खेती-बाड़ी में व्यस्त था। पत्नी के जिला परिषद अध्यक्ष बनने के बाद वह किसी भी प्रकार के नक्सली गतिविधियों में शामिल नहीं रह रहा था। इसके इस रवैये को टीपीसी के अन्य सुप्रीमो पचा नहीं पा रहे थे। संगठन के गतिविधियों में सबसे ज्यादा मुकेश गंझू और रविन्द्र उर्फ आक्रमण की क्षेत्र में सक्रियता थी।कोल परियोजना पिपरवार में मुकेश गंझू सक्रिय था वहीं टंडवा के मगध और आम्रपाली में आक्रमण की तूती बोलती थी। हाल के दिनों में कोल परियोजनाओं में लेवी वसूली और दहशत के जितने भी खेल हुए उसमे टीपीसी सुप्रीमो ब्रजेश गंझू,मुकेश गझू और आक्रमण की ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है । इसके बावजूद इनलोगो की गिरफ्तारी में पुलिस तन्त्र अब तक सफल साबित नहीं हो पाई है। नक्सली गतिविधि के कारण ही लगभग सभी नक्सली सुप्रीमो ने अपने परिजनों को राजनीतिक धारा में शामिल किया। टीपीसी सुप्रीमो का भाई गणेश गंझू सिमरिया विधानसभा से भाजपा विधायक है,दूसरे नम्बर के सुप्रीमो मुकेश गंझू की पत्नी आंगनबाड़ी सेविका है,तीसरे नम्बर के सुप्रीमो की पत्नी लावालौंग प्रमुख है।आपको बता दें कि कालांतर में राज्य सरकार ने दूसरे नक्सली संगठनों के खात्मे के लिए टीपीसी संगठन को पोषित किया था। सरकार के समर्थन के बलबूते पर टीपीसी सुप्रीमो ब्रजेश उर्फ गोपाल गंझू अपने भाई को विधायक बनाया था और क्षेत्र में अपना एकक्षत्र साम्राज्य स्थापित किया। टीपीसी के सुप्रीमो के बढ़ते मनोबल ने भाई को राजनीति में सक्रिय किया। टीपीसी अपने नक्सली गतिविधियों को बढ़ाने और पुलिसिया हमले से बचने की कवायद के तहत गणेश गंझू को विधानसभा भेजने में सफल रहा। परन्तु टीपीसी सुप्रीमो ने जिस प्रकार से चुनावी वैतरणी पार की थी,यह तरीका ही टीपीसी सुप्रीमो को भारी पड़ गया। विधानसभा चुनाव में अन्य दलों के जनप्रतिनिधियों को क्षेत्र में प्रचार पर रोक लगा दी गयी थी। वर्तमान सत्ताधारी दल भाजपा के कार्यकताओ के साथ साथ प्रत्याशी को भी क्षेत्र में प्रवेश की मनाही थी। चुनाव के बाद बदली परिस्थितियों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अब तो "टीपीसी" नक्सलियों की खैर नहीं । बहरहाल कोहराम की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने इन सभी अन्य तीनो सुप्रीमो की गिरफ्तारी सबसे बड़ी चुनौती है।

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आज से लगभग 7000 वर्ष पूर्व भगवान सदाशिव ने सरगम का आविष्कार कर मानव मन के सूक्ष्म अभिव्यक्तियों को प्रकट करने का सहज रास्ता खोल दिया था। इसी कड़ी में 14 सितंबर 1982 को झारखंड राज्य के देवघर में आनंद मार्ग के प्रवर्तक भगवान श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने प्रथम प्रभात संगीत" बंधु हे निये चलो" बांग्ला भाषा में देकर मानव मन को भक्ति उनमुख कर दिया। 8 वर्ष 1 महीना 7 दिन के छोटे से अवधि में उन्होंने 5018 प्रभात संगीत का अवदान मानव समाज को दिया। आशा के इस गीत को गाकर कितनी जिंदगियां संवर गई। प्रभात संगीत के भाव ,भाषा, छंद, सूर एवं लय अद्वितीय और अतुलनीय है। बांग्ला, उर्दू , हिंदी, अंगिका ,मैथिली, मगही एवं अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत प्रभात संगीत मानव मन में ईश्वर प्रेम के प्रकाश फैलाने का काम करता है। संगीत साधना में तल्लीन साधक को एक बार प्रभात संगीत रूपी अमृत का स्पर्श पाकर अपनी साधना को सफल करना चाहिए। इस पृथ्वी पर उपस्थित मनुष्य के मन में ईश्वर के लिए उठने वाले हर प्रकार के भाव को सुंदर भाषा और सूर में लयबद्ध कर प्रभात संगीत के रूप में प्रस्तुत कर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य जब पूर्ण भाव से प्रभात संगीत के साथ खड़ा हो जाता है, तो रेगिस्तान भी हरा हो जाता है। संगीत तथा भक्ति संगीत दोनों को ही रहस्यवाद से प्रेरणा मिलती रहती है। जितनी भी सूक्ष्म तथा दैवी अभिव्यक्तियां हैं, वह संगीत के माध्यम से ही अभिव्यक्त हो सकती है। मनुष्य जीवन की यात्रा विशेषकर अध्यात्मिक पगडंडियां प्रभात संगीत के सूर से सुगंधित हो उठता है।आजकल प्रभात संगीत एक नये घराने के रूप में लोकप्रिय हो रहा है ।

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देवानंद सिंह

केंद्र सरकार द्बारा एससी-एसटी अत्याचार निवारण एक्ट की धारा 18ए में किए जा रहे संशोधन को लेकर सवर्ण जातियों का गुस्सा उबाल पर आ गया है। बिहार के साथ-साथ जिस तरह देश के दूसरे राज्यों में विरोध की लहर दौड़ पड़ी है, उससे लगता है कि आने वाले दिनों में राजनीति की दिशा बदल सकती है, क्योंकि राजनीतिक दलों द्बारा सवर्णों को अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का हथियार बनाया जाता रहा है। कभी कांग्रेस ने झूठे सब्जबाग दिखाकर उन्हें दिग्भ्रमित किया तो अब बीजेपी की सरकार भी वही काम कर रही है। इस देश में सवर्ण अब अपने-आप को ज्यादा अहसाय महसूस करने लगा है, क्योंकि हिंदूवादी पार्टी होने का ढोंग रचने वाली बीजेपी की सरकार भी दलितों के आगे नतमस्तक है। वह भी ऐसे ही कानूनों की वकालत कर रही है, जिसकी वकालत हमेशा कांग्रेस करती आई है। जहां उसे राजनीतिक फायदा होना है, उसमें सरकार को कोर्ट के फैसले को भी बदलने में कोई गुरेज नहीं है। ऊपर से कहा जाता है कि हमारे देश में तो स्वतंत्र न्यायपालिका है। सच कहें तो बीजेपी की सरकार पर खाने के दांत अलग और दिखाने के दांत अलग वाली कहानी चरितार्थ हो रही है। 7० साल तक कांग्रेस ने हिंदुओं की एकता को खंडित करने के लिए जो जहर का बीज बोया, उसे भारत सरकार सींच ही रही है, तो यहां कांग्रेस और बीजेपी में अंतर क्या रह गया। एससी-एसटी एक्ट के नाम पर हर जगह आरक्षण दिया जा रहा है, लेकिन इस देश में सवर्ण को क्या मिला। क्यों सवर्ण को सिर्फ यहीं तक सीमित कर दिया जाता है कि वह सवर्ण तो संपन्न है, इसीलिए उसको आरक्षण की जरूरत नहीं है। सरकार में इतनी ताकत है तो वह आरक्षण के स्वरूप को बदलकर इसे आर्थिक रूप से देने का ऐलान करे। दूसरा, जहां तक एससी-एसटी अत्याचार निवारण एक्ट की धारा 18ए में किए जा रहे संशोधन की बात है, उससे साफ जाहिर होता है कि यह सरकार भी सवर्ण को दबाने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं कर रही है।

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देवानंद सिंह

आजादी की 72वीं वर्षगांठ को लेकर जितनी उत्सुकता लोगों में थी, उतनी ही उत्सुकता पीएम मोदी के लालकिले की प्राचीर से दिए जाने वाले भाषण को लेकर भी थी। यह भाषण उनका कार्यकाल का आखिरी भाषण था। अगले साल चुनाव होने हैं, इसीलिए जो नया प्रधानमंत्री चुनकर आएगा, वह लालकिले की प्राचीर से देश की संबोधित करेगा। पीएम मोदी ने अपने भाषण में देश की वर्तमान तरक्की पर जितने विस्तार से चर्चा की, उन्होंने पिछली सरकार को नाकामी के लिए ईशारों-ईशारों में ही काफी कोसा भी। चाहे शौचालयों के निर्माण की बात हो या फिर गैस कनेक्शन दिए जाने की बात। उन्होंने कहा कि अगर, 2०13 की रफ्तार से हम चल रहे होते तो न तो इतने तेजी से शौचालय बन पाते और न ही करोड़ों लोगों को गैस कनेक्शन मिल पाते। सच है कि देश विकास की तरफ अग्रसर है। दुनिया में भारत का डंका भी बज रहा है, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि हम आत्ममुग्ध होने की प्रवृत्ति को छोड़ नहीं पा रहे हैं। विकास निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होती है। हां, इतना निश्चित ही कहा जा सकता है कि उसको लेकर हमारी सरकारें और हमारा सिस्टम कितना गंभीर है, लेकिन हम उन तमाम मुद्दों और आजादी की मौलिकता को पहचानने में कोई गलती ना करें। इस दौर में भी अगर देश के अंदर बहुत सी समस्याएं मंुह बाएं खड़ी हैं तो उसका जिम्मेदार कौन है। सरकारें और सिस्टम। उस सिस्टम का हिस्सा वो लोग भी रहे हैं, जो स्वयं में आत्ममुग्ध होने की कोशिश करते हैं। चुनावी महागणित में मूल मुद्दों से भटक जाना निहायत ही चिंता पैदा करता है। एकबारीकी ऐसा लगता है कि हम 'आजादी’ के मायने समझ पाए हैं या फिर आजादी के मूल को तलाशते-तलाशते ऐसी उलझनों में फंसते जा रहे हैं, जिनसे निकलने की गुंजाइश तो दूर, बल्कि उलझनें और भी विराट रूप धारण कर रही हैं। रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं, महिलाओं की सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है, किसानों की बदहाली जस-की-तस है, देश में जातिवाद, धर्मवाद और सम्प्रदायवाद के नाम पर मार काट मची हुई है, सीमा पार से लगातार घुसपैठ बढ़ रही है, कश्मीर की समस्या सबके सामने हैं। यह सभी बड़े और व्यापक मुद्दे हैं। क्या केंद्र सरकार को या फिर स्वयं पीएम को इन मुद्दों के हल के लिए कोई विकल्प नहीं सुझाना चाहिए। राजनीतिक बैर के चलते ये मुद्दे हल होने के बजाय और भी उलझ रहे हैं। लिहाजा, यह कोशिश की जानी चाहिए कि सहयोगात्मक भावना को विकसित किया जाए और उस आम आदमी की तलाश को तेज कर दिया जाए, जो आजादी के इतने लंबे सफर के बाद भी कहीं गुम-सा हो गया है। वह आज भी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए भटक रहा है। आर्थिक असमानता का जो गैप समाज के बीच बढ़ा है, वह काफी चिंताजनक है। उसे पाटने के लिए सरकार कोशिश करे। महज,दावे करने से कुछ नहीं होता है। आम आदमी को सिर्फ वोट की महफिल में शामिल न किया जाए, बल्कि उसके बारे में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। आज के हालातों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वह बात कराहती नजर आती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि आजादी के मायने तब सिद्ध होंगे, जब तक समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति का भला होगा। क्या सबसे निचले पायदान पर बैठा व्यक्ति आज भी शोषित नहीं है ? क्या उसकी पीड़ा बस वोट बैंक का खजाना भर नहीं रह गई हैं? तमाम ऐसे सवाल हैं, जो नेतृत्व की तरफ अंगुली उठाते हैं और आजादी को आम आदमी की दृष्टि से निरर्थक साबित करते हैं। आजादी की इतनी लंबी यात्रा में आज भी आम आदमी रोटी, कपड़ा और मकान से महफूज क्यों है ? जबकि इसी आजादी के परिवेश में पले-बड़े नेता इतने अमीर कैसे हो गए ? इन नेताओं का विदेशों में करोड़ों रुपए का कालाधन कैसे जमा हो गया ? भ्रष्ट सरकारी मशीनरी की तह इतनी गहरी कैसे हो गई है कि उसमें बस सरकारी तंत्र में बैठे लोग ही विकास के पैमाने छूते नजर आते हैं और आम आदमी विकास के पायदान में नीचे ही चला जा रहा है। कुल मिलाकर, विकास की दौड़ में सरकार के लिए आम आदमी को भी साथ लेकर चलना जरूरी होगा, तभी आजादी की असल सर्थकता समझ आएगी।

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देवानंद सिंह

आनंद बाजार पत्रिका द्बारा संचालित एबीपी न्यूज से दो बड़े पत्रकारों के इस्तीफे और तीसरे को काम करने से रोकने की घटना पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है.चैनलों, अखबारों और दूसरे मीडिया हाउसों से पत्रकार इस्तीफा भी देते हैं और उन संस्थानों में नौकरी भी हासिल करते हैं.यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होती है, लेकिन दो बड़े पत्रकारों का एक साथ चैनल से इस्तीफा देना और एक को लंबी छुट्टी पर भेज देना, एक नए दौर की तरफ र्इशारा कर रहा है, क्योंकि यह प्रकरण उसके बाद हुआ, जब चैनल के चर्चित शो 'मास्टर स्ट्रोक’ में छत्तीसगढ़ की उस महिला किसान की आय दोगुनी होने से संबंधित सरकार के दावे का खंडन प्रसारित किया गया. महिला ने पीएम मोदी से वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए कहा कि सरकार द्बारा किसानों के लिए संचालित योजना के बाद ही उनकी आय दोगुनी हुई है, लेकिन जब चैनल के रिपोर्टर ने इस तथ्य की सच्चाई जानी तो पता लगा कि वास्तव में महिला की आय दोगुनी नहीं हुई है, बल्कि उसने वही बोला, जो उससे बोलने के लिए कहा गया था.इसी तथ्य पर आधारित स्टोरी चैनल के चर्चित शो में प्रसारित की गई.यहां बता दें कि चैनल के शो 'मास्टर स्ट्रोक’ की एकंरिंग जाने-माने पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी करते थे. इसके बाद चैनल प्रबंधन ने साफ तौर पर किसी आलोचना से संबंधित स्टोरी में पीएम नरेंद्र मोदी का नाम नहीं लेने की सख्त हिदायत दे दी.यह सब परिस्थितियां नए हालातों को प्रदर्शित करती हैं. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है, अगर सरकार की आलोचना करने पर किसी पत्रकार से सरकार के दबाव में इस्तीफा ले लिया जाता है तो यह निश्चित ही, लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. खबर की मौलिकता को समझा जाए तो खबर वही होती है, जो होना चाहिए और नहीं हो रहा है, क्योंकि जो हो रहा है, प्रतिनिधि उसी के लिए चुना जाता है.काम करने के एवज में वह सारी सुख-सुविधाओं का भोग करता है. ऐसे में, अगर झूठ को जबरदस्ती फैलाया जा रहा है तो यह निश्चित ही लोकतंत्र के चौथ्ो स्तंभ को कुचलने की भी कोशिश है और गरीब किसानों का भी मजाक है. जब सरकार के अच्छे कामों के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का नाम लेना आवश्यक है तो सरकार की विफलता का जिम्मेदार कौन होगा ? जो सरकार का नेतृत्व कर रहा है, यह सब उसी की जिम्मेदारी बनती है.सरकार बहुत से मुद्दों को लेकर बातें तो करती रही है, लेकिन उन मुद्दों और योजनाओं की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है.क्या उस हकीकत को जनता को जानने का अधिकार नहीं है? लोकतंत्र में इन कमियों को उजागर करने की जिम्मेदारी या तो विपक्ष के पास होती है या फिर पत्रकारों के पास.सच्चाई में यह जिम्मेदारी सत्ता पक्ष में बैठे हुए लोगों से भी बड़ी होती है, क्या ऐसे में अगर किसी पत्रकार ने उस सच्चाई को लोगों के सामने पेश किया है तो वह कहां का गलत है? सरकार के नुमांइदों ने उस महिला को झूठ बुलवाने से पहले उसकी तथ्यात्मक जानकारी क्यों नहीं ली. क्या यह जानना जरूरी नहीं था कि सरकार द्बारा किसानों के लिए संचालित योजनाओं का लाभ वकाई उन्हें मिल रहा है या फिर यह सब हवा-हवाई है.जब सरकारी योजनाएं जरूरतमंदों तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं तो इन योजनाओं का फायदा क्या?इन हालातों में सरकार के लिए योजनाओं की सच्चाई दिखाने वालों से खुन्नस खाने के बजाय जमीनी हकीकत को जानने-समझने की जरूरत है, क्योंकि लोकतंत्र में परिवर्तन की बयार कभी भी आ सकती है, क्योंकि झूठ के बल पर न तो चुनाव जीता जा सकता है और न ही सत्ता की रेस लंबे समय के लिए जीती जा सकती है.सत्ता में रहने के दौरान पेंशस व अलोचना सुनने की क्षमता जरूरी होती है.योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन तभी हो सकता है, जब उसकी जमीनी सच्चाई पता होगी. अगर, सफलता का श्रेय लेना अच्छा लगता है तो विफलता की जिम्मेदारी भी तो लेनी ही होगी.

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देवानंद सिंह

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जिस तरह अपने दरबार में एक शिक्षिका के साथ व्यवहार किया, वह सत्ता की ताकत के घमंड को दर्शाता है। राज्य का मुखिया होने के नाते सीएम को जहां अपने व्यवहार में विनम्रता लानी चाहिए थी, वहां एक लाचार महिला शिक्षका के साथ घमंड के साथ के पेश आना इस बात को भी दर्शाता है कि सत्ता में पहुंचने वाला व्यक्ति हर चीज को अपनी बपौती समझने लगता है। यही वजह है कि सरकारी गलियारों में भी सिर्फ चाटुकारों का ही उद्बार होता है, जो मेहनत, ईमानदारी और सच्चाई के साथ सामने आता है, उसको भरी सभा में ऐसी ही जलालत झेलनी पड़ती है।
इस घटना के बाद प्रदेश में बड़ा सियासी ड्रामा देखने को मिला। परत-दर-परत चीजें सामने आने लगीं तो सीएम और सरकार ही कटघरे में खड़े दिखाई दिए। सोशल मीडिया ने जिस तरह शिक्षिका के समर्थन में मुहिम चलाई, वह काफी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि सरकार और उसके चाटूकारों ने इस घटना को दबाने की बहुत कोशिश की। देहरादून से निकलने वाले बहुत से राष्ट्रीय और स्थानीय अखबारों ने तो सरकार के पक्ष में खबरें छापी। कुछ अखबारों ने छापा कि शिक्षिका एक साल से स्कूल जा ही नहीं रही है।
अगर, इस बात को लेकर शिक्षका को घ्ोरने का प्रयास किया भी जा रहा है तो त्रिवेंद रावत की सरकार कितनी पारदर्शी है इसके चिट्ठे तो सामने आ ही रहे हैं। अगर, शिक्षिका स्कूल नहीं जा रही है तो यह गलती किसकी है, शिक्षा विभाग और सरकार की। वैसे भी स्वयं शिक्षिका ने सीएम दरबार में ही बोल दिया था कि वह स्कूल नहीं जा रही हैं, अगर सिस्टम ने उनकी बात सुन ली होती तो निश्चित ही ऐसी परिस्थिति नहीं आती। वह किस तरह पारिवारिक दिक्कतों का सामना कर रही है, वह स्पष्ट है। क्या सीएम और उनके अधिकारियों की संवेदनाएं मर गईं हैं कि एक परेशान शिक्षिका की समस्या का हल नहीं निकाला जा सका।
सवाल तो बहुत सारे हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि अगर, आपकी पत्नी 26 सालों की सर्विस में 22 साल तक सुगम स्कूल में तैनात रह सकती है तो उत्तरा पंत बहुगुणा 25 साल दुर्गम क्ष्ोत्रों में नौकरी करने के बाद सुगम स्कूल में तैनाती क्यों नहीं पा सकती हैं ? अगर, उत्तरा पंत बहुगुणा ने यह बॉड भरा है कि वह दुर्गम क्ष्ोत्रों में ही नौकरी करें तो आपकी पत्नी ने भी यह बॉड नहीं भरा है कि वह पूरी सर्विस सुगम क्ष्ोत्र में ही तैनात रहेंगी। यह कहां का न्याय है।
आपने दरबार लोगों की समस्याओं को सुनने और उनको न्याय दिलाने के लिए लगाया था, न कि एक पीड़ित बेहसहारा महिला को अपमानित करने के लिए। नैतिकता तो यह कहती थी कि महिला शिक्षिका की समस्या सुनने के बाद आप फौरन शिक्षा विभाग के संबंधित अधिकारियों को तलब करते और उनसे पूछते कि 25 सालों में उत्तरा पंत बहुगुणा को क्यों कोई सुगम स्कूल नहीं दिया गया। जब विभाग के दर पर महिला अपनी यह समस्या बता रही है कि उसके पति के मौत के बाद बच्चे अकेले हैं और उसे देहरादून के किसी ऐसे स्कूल में तैनाती दे दी जाए, जहां वह अपने बच्चों के पास भी रह सके। इन सब परिस्थितियों के बाद भी अगर महिला शिक्षिका को न्याय नहीं मिला तो यह अधिकारियों और सीएम की मानवीय संवेदना पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। जनता द्बारा चुने हुए सीएम को अगर इतना घमंड है तो अधिकारियों और सरकार के चाटूकारों को क्यों घमंड नहीं होगा।
इस सारे प्रकरण में जहां त्रिवेंद्र सिंह रावत व उनका पूरा सिस्टम सवालों के घ्ोरे में है, वहीं विपक्ष भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। कांग्रेसी नेता व उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत, जो आज सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, वह भी इस प्रकरण के जिम्मेदार हैं। महिला शिक्षिका तो उनके दर पर भी गई थी, लेकिन उन्हें तब भी इंसाफ नहीं मिल पाया। जब सत्ता में ऐसे लोग बैठ जाएं तो लोकतंत्र मजबूत नहीं होता है, बल्कि उसका उपहास होता है। इनके राज में महज चाटूकारों का ही भला हो सकता है, जो ईमानदार प्रवृत्ति के लोग हैं, उन्हें महज परेशानियां ही झेलनी पड़ती हैं। कुल मिलाकर यह जनता के लिए भी सबक है और नेताओं के लिए भी। ऐसे नेताओं की प्राथमिकता को दरकिनार कर देना चाहिए, तभी इन नेताओं का यह मुगालता खत्म होगा कि भले ही वह सत्ता के शिखर पर हैं, लेकिन सबकुछ उनकी बपौती नहीं है।

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देवानंद सिंह

उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों के परिणाम सामने आ गए हैं। जिसमें बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। इस हार का न केवल बीजेपी को स्वयं अंदाजा था बल्कि लोगों को भी ऐसा अनुमान नहीं था। जिस उत्तर के बल पर बीजेपी ने लोकसभा और विधानसभा में जाने का अपना सपना पूरा किया था, अगर वहीं से पार्टी के नुकसान की शुरूआत हो गई है तो इसका असर निश्चित ही 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में अवश्य दिखेगा। बीजेपी सुबह के रुझानों में आगे चल रही थी, लेकिन दोपहर होते-होते फूलपुर पर पिछड़ी और फिर दोनों ही सीटें पार्टी ने गंवा दी। यह किसी और दल की जीत से ज्यादा बीजेपी की बड़ी हार थी, क्योंकि फूलपुर सीट उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और गोरखपुर सीट खुद सीएम योगी आदित्यनाथ की थी। इन सीटों पर बीजेपी की शाख दांव पर थी, जो उनसे समाजवादी पार्टी ने हथिया ली।
     दीगार बात है कि 2014 की मोदी लहर में बहुमत से लोकसभा में आई बीजेपी इसके बाद राज्यों के चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन करती रही। भारत पर चढ़ता भगवा रंग पूर्वोत्तर तक जा पहुंचा, लेकिन छोटे चुनावों में बीजेपी की भद्द पिटती रही। 2014 के बाद 15 सीटों पर उपचुनाव हुए और उनमें से केवल दो सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई। 2017 और 2018 में आठ सीटों पर हुए उपचुनाव में एक सीट भी बीजेपी अपने नाम नहीं कर सकी।
2018 में उत्तर प्रदेश और राजस्थान में उन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए जो पहले बीजेपी के नाम थीं। राजस्थान में दोनों सीटें कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में दोनों सीटें एसपी ने जीतीं और बीजेपी को कुछ नहीं मिला। 2018 में एक-एक सीट पर बिहार और पश्चिम बंगाल में भी उपचुनाव हुए, लेकिन वहां सीटें पहले की तरह आरजेडी और टीएमसी के पास ही रहीं।2014 की मोदी लहर के बाद जिन दो सीटों पर बीजेपी उपचुनाव में जीत हासिल कर सकी है, वे सीटें पहले भी बीजेपी के ही पास थीं। इस तरह अगर तरीके से समझा जाए तो 2014 के बाद देशभर की जिन 15 सीटों पर उपचुनाव हुए हैं, उनमें एक भी नई सीट बीजेपी हासिल नहीं कर पाई है, जबकि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की तरह ही अपनी पांच पुरानी सीटें भी गंवाई हैं।
   ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी उपचुनावों में हारती क्यों है, इसका कोई एक सीधा जवाब तो नहीं, लेकिन कई बातें हैं जो हर उपचुनाव पर लागू होती हैं। दरअसल, बीजेपी के प्रचार करने का तरीका अजेंडों पर आधारित है, ये एजेंडे जगह के हिसाब से कभी हिदुत्व, कभी बीफ, कभी विवाद तो कभी विकास होते हैं। ये अजेंडे बड़े क्षेत्र पर लहर लाने में तो कामयाब होते हैं, लेकिन उपचुनाव में इक्का-दुक्का सीटों पर ऐसे अजेंडे मतदाता को बड़े स्तर पर लुभा नहीं पाते।
मिशन 2019 की तैयारी में जुटी बीजेपी के लिए हाल-फिलहाल सबसे ज्यादा चुनौती उन्हीं 7 राज्यों से उठती दिख रही है, जो 2014 में उसकी कामयाबी में नींव का पत्थर साबित हुए थे। बीजेपी को पूरे देश से जो 282 सीटें मिली थीं, उनमें से 196 सीटें यूपी, महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान से मिली थीं। इन सात     राज्यों का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से 273 सीटें इन्हीं राज्यों से आती हैं, यानि 36 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व ये राज्य ही करते हैं। इन राज्यों से 44 सीटें बीजेपी के सहयोगी दलों के खाते में भी गईं थीं।
इन राज्यों में बीजेपी के लिए स्थितियां अनुकूल न दिखने की वजह अलग-अलग हैं। कहीं नए सामाजिक समीकरणों ने बीजेपी के लिए चुनौती पेश कर दी तो कहीं सहयोगी ही ताल ठोककर मुकाबले में आ गए हैं।
     बता दें कि उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं। 2014 के चुनाव में बीजेपी को 71 और उसके सहयोगी अपना दल को दो सीटों पर जीत मिली थी, अब यहां इस एसपी-बीएसपी के नजदीक आने से समीकरणों का पलट जाना तय माना जा रहा है। गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में इसकी झलक मिल भी गई है। दरअसल, ये दोनों पार्टियां मजबूत वोट बैंक रखती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों के वोट एक दूसरे को ट्रांसफर भी हो जाते हैं। राज्य में मोस्ट बैकवर्ड का जो सबसे बड़ा हथियार बीजेपी का था, उसे भी यह गठबंधन हथियाता हुआ दिख रहा है। उपचुनाव में एसपी ने दोनों सीटों पर मोस्ट बैकवर्ड उम्मीदवार ही दिए और उसका दांव कामयाब रहा, जो बीजेपी के लिए शुभ नहीं है।

 

 

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मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में रघुवर सरकार ने कई फैसलों पर मुहर लगाई। सरकार और भाजपा ने कैबिनेट के फैसलों पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि सरकार ने जनता की मंशा को समझते हुए सारे फैसले लिए हैं। सरकारी एवं खासमहाल भूमि के नीति निर्धारण की स्वीकृति को भी भाजपा ने जनहित में बड़ा कदम बताया। फैसले के अनुसार अब भूमि की लीज बंदोबस्ती केवल उन व्यक्तियों के बीच की जाएगी, जो 1985 के पूर्व भूमि पर घर बना कर रह रहे हैं। अधिकतम 10 डिसमिल भूमि आवासीय उद्देश्य हेतु लीज बंदोबस्ती की जाएगी। यह लीज बंदोबस्ती अहस्तांतरणीय होगी। केवल उत्तराधिकार नामान्तरण अनुमान्य होगा। सरकार के इस फैसले को जनविरोधी बताए जाने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। झारखंड विकास मोर्चा ने कैबिनेट के इस फैसले को बिल्कुल ही निराशाजनक माना है। मोर्चा के केंद्रीय महासचिव अभय सिंह ने कहा कि वर्षों से बसे 86 बस्तियों के साथ धोखा और क्रूर मजाक हुआ है। यह समझने का फेर है कि बहुत ही चालाकी से झारखंड कैबिनेट का फैसला जनता को गुमराह करने वाला है, क्योंकि कैबिनेट ने क्या फैसला लिया, यह समझने का प्रयास जनता को करना होगा। कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि फैसलों पर राजनीतिक गतिरोध होना लाजिमी होता है। सियासी तौर पर कैबिनेट के फैसले कितने उचित हैं, इसके असली मार्क्स तो जनता द्वारा ही दिए जाएंगे। जिसको स्पष्ट होने में या तो चुनावों तक इंतजार करना होगा या फिर धीरे-धीरे जनता की प्रतिक्रिया सामने आएगी, लेकिन कुछ मुद्दों पर मंथन किया जाए तो उसमें सरकार की तरफ से वह कोशिश नहीं झलकी है, जिसकी मांग जनता की तरफ से की जा रही थी। इसमें 86 बस्ती को मालिकाना हक दिलाने का मुद्दा काफी प्रमुख है, क्योंकि इसको लेकर राज्य में व्यापक तौर पर आंदोलन भी किए जा रहे थे। सरकार इसमें सफल नहीं हुई है। इस परिस्थिति में एक सबसे बड़ी समस्या जो बनकर उभरेगा, वह यह है कि एक तरफ बिरसानगर में आधे से अधिक लोग 10 डिसमिल से अधिक जमीन ले करके रह रहे हैं, क्या उनकी जमीन वापस होगी? या सरकार उसकी बंदोबस्ती करेगी ? यहां बता दें कि 1987 के बाद 86 बस्ती में रहने वाले बस्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जैसे कल्याण नगर, चंडी नगर, बारीडीह बस्ती, शांति नगर, बारीडीह पटना लाइन मोहरदा के अर्जुन कॉलोनी, मछुआ बस्ती, बागे बस्ती, निर्मल नगर, छाया नगर, लाल भट्टा, बाबुडीह बस्ती, कैलाश नगर, कंचन नगर तैसी तमाम बस्तियां हैं, जो 90 के बाद बसी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार कैसे तय कर पाएगी कि 1985 के पहले से कौन बस्ती है और 1985 के बाद कौन सी? जानकार इसके पीछे जो मुख्य वजह बताते हैं, वह यह है कि रघुवर दास 1995 में पहली बार विधायक बने थे और उस समय इन बस्तियों में वोटर लिस्ट भी नहीं था। क्या रोज कमाने और रोज खाने वाला व्यक्ति इतना सलामी दे सकेगा? कैबिनेट के फैसले के विरोध को भाजपा उचित नहीं मान रही है। भाजपा का तर्क है कि सरकार की यह पहल प्रशंसनीय है। इस पहल से 1985 से पूर्व सरकारी एवं खासमहाल भूमि पर घर बनाकर रह रहे लोग लाभांवित होंगे। आवासीय उद्देश्य से 10 डिसमिल तक भूमि लीज बंदोबस्ती करने से निवासियों के भय और संशय के बादल छंट जाएंगे। कैबिनेट के निर्णय के बाद अब इन बस्तियों को अवैध और अतिक्रमित बस्तियों में नहीं गिनी जाएगा। इसके अतिरिक्त भी कैबिनेट ने कई अन्य महत्वपूर्ण फैसलों पर मुहर लगाई है। दूसरी पार्टियां और एक्सपर्ट्स अपने-अपने तरीके से सरकार के फैसलों का आंकलन कर रहे हैं, लेकिन देखने वाली बात यह है कि जिस प्रकार सरकार ने फैसलों में एक संतुलन बनाने की कोशिश है, उससे लगता है कि सरकार ने सियासी तौर पर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। विपक्षियों और एक्सपर्ट्स का जो भी आंकलन हो, लेकिन अभी जनता की अदालत में इन फैसलों का आंकलन होना बाकी है।

 

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देवानंद सिंह

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों का परिणाम सबके सामने है। बीजेपी की जीत के परिपेक्ष्य में देख्ों तो परिणामों ने बहुत अधिक चौंकाया नहीं, क्योंकि एग्जिट पोल में दोनों ही राज्यों में बीजेपी की जीत के साफ संकेत दिख रहे थे। कांग्रेस की हार के परिपेक्ष्य में देखो तो निश्चित ही आश्चर्य होता है, क्योंकि हार के बाद भी वह अच्छा मुकाबला देने में सफल रही है। लेकिन परिणामों से साफ संदेश दोनों ही बड़ी पार्टियों को मिला है। सत्तारुढ़ पार्टी यह न सोचे कि वह गुजरात में लगातार छह विधानसभा चुनाव जीत चुकी है, लेकिन सीटें जीतने का ग्रॉफ इस बार 100 सीटों के आकड़े को नहीं छू सका, जबकि पिछले पांच विधानसभा चुनावों में उसने 100 से भी अधिक सीटें जीतीं थीं। ऐसे में, पार्टी को मंथन करने की जरूरत है कि वे कौन-से कारण रहे, जिसकी वजह से पार्टी की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। कांग्रेस के परिपेक्ष्य में स्थिति देख्ों तो उसे भी मेहनत करने की जरूरत है। उसे जनता के बीच और विश्वास कायम करना होगा, जिससे भविष्य में उसके जीत का ग्रॉफ तेजी से आगे बढ़ सके। इस बार के परिणाम से निश्चित ही लगता है कि कांग्रेस पिछले चुनावों की अपेक्षा बेहतर स्थिति में रही है। उसे मुद्दों को भुनाने की रणनीति पर और काम करना होगा, तभी वह बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर सकती है। उधर, हिमाचल की बात करें तो निश्चित ही बीजेपी के लिए संतोषजनक परिणाम रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड देख्ों तो हिमाचल में अमुमन सत्ता परिवर्तन देखने को मिला है, लेकिन पिछले परिणामों से अगर कांग्रेस सबक नहीं सीख पाई तो यह पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं कहे जा सकते हैं, क्योंकि जिस तरह हिमाचल प्रदेश में भ्रष्टाचार और बच्ची से रेप जैसी शर्मनाम घटनाएं सामने आईं, उससे कांग्रेस सरकार के लिए सत्ता वापसी का कोई चांस नहीं बचा था। अगर, इन परिस्थितियों में वहां बीजेपी ने सत्ता में पूरे बहुमत के साथ वापसी की है तो इसे अच्छी सफलता ही माना जाएगा। यहां देखने वाली बात यह होगी कि क्या बीजेपी सत्ता पाने के गुमान से ऊपर उठते हुए कुछ काम करके दिखाएगी, जिससे हिमाचल प्रदेश के वोटर अपनी परिपाटी को दरकिनार कर भविष्य में भी बीजेपी को ही मौका देते रहेगी। इसके लिए उसे काम करने की जरूरत पड़ेगी। दोनों राज्यों में चुनावों की एक खास बात यह रही है कि भले ही जनभावना ने बीजेपी को सत्ता सौंपी हो, लेकिन दोनों ही राज्यों की जनता ने स्वच्छ विपक्ष भी दिया है, जो सत्तारुढ़ पार्टी को कुछ काम करने के लिए प्रेरित करते रहे। गुजरात में 182 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 99 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि कांग्रेस 8० सीटें जीतने में सफल रही है और अन्य को तीन सीटें मिली हैं। वहीं, हिमाचल प्रदेश की बात करें तो कुछ 68 विधानसभा सीटों में से बीजपी को 44 और कांग्रेस को 21 सीटें मिली हैं। यहां भी अन्य को तीन सीटें गईं हैं। गुजरात में आम आदमी पार्टी के परिपेक्ष्य में बात करें तो उससे ज्यादा वोट तो नोटा में पड़े हैं। ऐसे में, आम आदमी पार्टी को बहुत ज्यादा नहीं उछलते हुए आत्ममंथन करने की जरूरत है और फिलहाल, अपना फोकस दिल्ली पर रख्ो, जिससे अन्य राज्यों में भी यह मैसज जा सके कि हां आम आदमी पार्टी दिल्ली में बेहतर काम कर रही है तो उसे संबंधित राज्य में भी मौका दिया जाना चाहिए। जहां तक इन चुनाव परिणामों को 2०19 में होने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देख्ों तो एक बेहतर मैसेज दोनों ही ख्ोमों में जाता है। बीजेपी इस मलाल में बिल्कुल भी न रहे कि वह 2०19 में भी प्रचंड जीत हासिल करेगी, अगर यहां नए नेतृत्व के साथ कांग्रेस अपनी जमीनी पकड़ को मजबूत करती है तो निश्चित ही मुकाबला कांटे का हो सकता है। ऐसी, परिस्थितियों में 2०19 का चुनाव बेहद दिलचस्प होगा।

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