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बाढ: प्रभावित लोगों का जल्द हो पुनर्स्थापन Featured

Written by  Published in Opinion Wednesday, 20 September 2017 06:33

रश्मि सिंह 

भले ही बिहार में बाढ़ का कहर धीरे-धीरे कम हो रहा है, लेकिन बाढ़ के दौरान जो पूरा परिदृश्य रहा है, वह बहुत से सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या आम और बेसहारा लोग इसी तरह से जूझने के लिए होते हैं ? प्राकृतिक आपदा कब आ जाए, इसका कुछ पता नहीं चलता है, लेकिन क्या राज्य से लेकर केंद्र सरकार कुछ तैयारियों के चलते ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम नहीं कर सकती हैं ? यह स्थिति सबसे अधिक भयावह होती है कि जब लोग बेघर हो रहे हों और उन तक समय से राहत सामग्री न पहुंचे। क्या यह सरकार और उस मशीनरी की गलती नहीं है, जो इन कामों में लगे हुए हैं। बाढ़ के चलते लगभग 15 हजार करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान लगाया गया है। यह बात स्वयं बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री प्रो. चन्द्रशेखर ने स्वीकार की है। स्वाभाविक है कि बिहार को केंद्र सरकार से उसी अनुरूप मदद मिलनी चाहिए थी। यह बात सबको मालूम है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के बाढ़ प्रभावित ईलाकों का दौरा भी किया, लेकिन आर्थिक मदद के रूप में महज 500 करोड़ रुपए की सहायता की घोषणा की, जो राहत राशि नुकसान के अनुरूप कहीं भी नहीं टिकती है। क्या केंद्र को और बड़ी राहत राशि नहीं देनी चाहिए थी ? बाढ़ समाप्त होने के बाद ऐसे लोगों की समक्ष चुनौतियां कम नहीं होती हैं, उन्हें पुनर्स्थापित करना बड़ी चुनौती का हिस्सा होता है। यह काम सरकार कर सकती हैं, क्योंकि जो लोग प्रभावित होते हैं, उनके पास कुछ भी नहीं बचा होता है। वे लोग सबकुछ बाढ़ के कहर में खो चुके होते हैं। राज्य सरकार की केंद्र सरकार से नजदीकियां बढ़ने के बाद केंद्र द्वारा कम राहत राशि का ऐलान करना निश्चिततौर पर चौंकाता है। बकायदा, अब तो बिहार में बीजेपी के साथ गठबंधन वाली सरकार चल रही है। पीएम मोदी के साथ हवाई सर्वेक्षण में स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी भी मौजूद थे। ऐसे में राहत राशि के रूप में अधिक धनराशि की उम्मीद किया जाना बिल्कुल भी गलत नहीं था। नुकसान के अनुरूप राहत राशि नहीं देने के पीछे क्या कारण रहे हैं, यह केंद्र और राज्य सरकारें ही बता सकती हैं।
यह बात दीगार है कि बिहार हर साल बाढ़ से जूझता है। इस बार भी बाढ़ की भंयकर त्रासदी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मरने वालों की संख्या 367 तक पहुंच गई है। प्रभावित लोगों की बात करें तो राज्य के 19 जिलों के करीब एक करोड़ 58 लाख लोग इस बार के बाढ़ में प्रभावित हुए हैं। शुक्र इस बात का माना जाना चाहिए कि आर्मी व रेक्यू टीमों ने प्रभावित लोगों को राहत शिविरों तक पहुंचाने में बहुत तेजी दिखाई। इसमें भी ढिलाई बरती जाती है तो जाहिर था कि मौतों का आकड़ा और भी ऊपर जा सकता था। बिहार में बाढ़ का कहर बारिश के साथ-साथ नेपाल से पानी छोड़े जाने की वजह से भी बरपा। यहां जरूरी लगता है कि नेपाल भी आंख मूंदकर पानी न छोड़े, बकायदा यहां की स्थानीय सरकार को भरोसे में लेकर ऐसा कदम उठाए, जिससे उन क्षेत्रों के लोगों को समय रहते राहत शिविरों तक पहुंचाया जा सके । समय रहते चीजें अमल में लाईं जाएं तो निश्चित तौर न तो मौतों का आकड़ा सैकड़ों में पहुंचता और न ही प्रभावित लोगों की संख्या लाखों में पहुंचती। अब कोशिश की जानी चाहिए कि प्रभावित लोगों का समय से पुनर्स्थापित किया जाए, उन तक राहत सामग्री समय रहते पहुंचाए जाए, उनके स्वास्थ व उनके बच्चों की शिक्षा को सुचारू किया जाए।

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