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कांग्रेस के लिए संजीवनी होगा 2019 का चुनाव Featured

Written by  Published in Opinion Wednesday, 20 September 2017 06:45

देवानंद सिंह 

2014 लोकसभा चुनाव हारने के बाद यूपीए के समक्ष 2019 का चुनाव काफी मायने रखता है। बीजेपी भी इस बात को जानती है, लेकिन देखने वाली बात होगी कि यूपीए किस संजीवनी के तहत 2019 को फतह करेगी। किन फार्मूलों के तहत वह 2019 के लिए रणनीति तय करेगी। आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर संगठन में कुछ परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। चाहे वह राहुल की ताजपोशी की बात हो या फिर संगठन के निचले स्तर पर सक्रियता को तेज करने के साथ-साथ नये चेहरों के साथ मैदान मारने की कोशिश हो। कांग्रेस के रणनीतिकार भी मानते हैं कि सरकार की विफलताओं को भी लोगों के सामने लाना यूपीए के लिए एक अच्छा विकल्प होगा, जिसके आधार पर बीजेपी व उसके घटक दलों को धूल चटाई जा सकती है।
कई असफल कोशिशों के बाद भी कांग्रेस इस बात को लेकर आश्वस्त है कि 2019 तक महागठबंधन नये रंग में दिखेगा और जनता भी कोशिश करेगी कि सेकुलर पार्टियों के गठबंधन को तरजीह दी जाए, क्योंकि बीजेपी शासन काल के दौरान जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, वे कहीं-न-कहीं लोगों को विचलित करने वाली हैं। इनमें कई बुद्धजीवियों की निर्मम हत्या का मामला भी है। सवाल इन मुद्दों को भुनाने का होगा। दूसरा, अगर महागठबंधन को मजबूत करना है तो उसके लिए आपसी सहमति पर विशेष बल देना होगा। इसके आधार पर व्यापक जनाधार को अपनी तरफ खींचा जा सकता है। नोटबंदी के विरोध में वैसे
कांग्रेस ने पिछले 25 दिसंबर को विपक्षी दलों की जो साझा बैठक बुलाई थी, उसमें सीपीएम, एनसीपी, जेडीयू समेत कई बीजेपी विरोधी दल शामिल नहीं हुए थे, जिससे महागठबंधन की कमजोरी झलकती है। इस कमजोरी को दूर करने के लिए आपसी विश्वास की डोर को मजबूत करना होगा। इसके अलावा राष्ट्रपति चुनाव से पहले 22 जून को सोनिया गांधी की अगुवाई में 17 पार्टियों के 30 दिग्गज महागठबंधनी तस्वीर के एक ही चौखटे में समाते जरूर नजर आए थे, लेकिन ये लोग समय रहते राष्ट्रपति पद का संयुक्त उम्मीदवार ही नहीं तय कर पाए। लिहाजा, हालत यह हो गई कि कि संयुक्त विपक्ष का एक विश्वसनीय चेहरा और संभावित महागठबंधन की ओर से पीएम पद की उम्मीदवारी का सामर्थ्य रखने
वाले नीतीश कुमार की एनडीए में 'घर वापसी' हो जाने से विपक्षी एकजुटता की 'लालटेन' का उजाला कम होता दिखने लगा है। क्या ऐसे में कांग्रेस के लिए जरूरी नहीं होगा कि वह स्वयं के अंदर पुराने दमखम को वापस ले जाए, जिससे उसे दूसरी पार्टियों पर बहुत अधिक निर्भर न होना पड़े।
जान फूंकने की कोशिश
कांग्रेस हर हाल में पार्टी के निचले स्तर से ही जान फूंकना चाहती है। ऐसे में, हर राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक पार्टी की पकड़ को मजबूत करने के लिए खाका तैयार करने में जुटी हुई है। बताया जा रहा है कि पार्टी हाईकमान को जहां भी बदलाव की स्थिति दिखेगी, वहां बदलाव किया जाएगा, क्योंकि बेहतर मैसेंजर की तरफ पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को कोशिश करनी होगी कि जनता के समक्ष सत्तारूढ़ पार्टी की कमियों को कैसे रखा जाए। एक बेहतर कम्युनिकेशन के तहत जनता से लगातार संपर्क में रहा जाए, जिससे 2019 को फतह करने में पार्टी को सफलता मिल सके।
शरद यादव की कोशिश
बुझती लालटेन के उजाले को फिर से तेज करने के लिए कभी एनडीए के संयोजक रहे और अब जेडीयू से बगावत कर बैठे शरद यादव ने बीती 17 अगस्त को साझा विरासत बचाओ उर्फ विपक्ष बचाओ सम्मेलन दिल्ली के कॉन्स्टट्यिूशन क्लब में आयोजित किया था। इस मंच पर 17 राजनीतिक दलों के नुमाइंदे दिखे। कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, एसपी, बीएसपी, एनसीपी, आरजेडी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, जनता दल (सेक्यूलर) और आरएलडी समेत कई अन्य छोटी-मोटी पार्टियों के नेताओं ने देश की साझा विरासत को बचाने की कसमें खाईं हैं। इससे निश्चित तौर पर उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्यों में एक-दूसरे के धुरविरोधी दलों को राष्ट्रीय पटल पर जोड़े के रखा जाए।
परिवर्तन चाहती है जनता
देश की जनता जल्दी-जल्दी परिवर्तन चाहती है। ऐसे में, यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सत्तारूढ़ बीजेपी ही सत्ता में रहेगी। देश के राजनीतिक इतिहास में पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जिससे जमी हुई सरकारें भी मुंह के बल गिर गईं। ऐसा ही एक उदाहरण है 1977 का। जनता परिवार ने 1977 में चट्टानी कांग्रेस को उखाड़ फेंका था और वीपी सिंह-देवीलाल ने 1989 में प्रचंड बहुमत वाले राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सत्ता को हिला दिया था। क्या ऐसा नहीं लगता है कि कांग्रेस के लिए भी यह वैसा ही वक्त है, जब वह ज्वंलत मुद्दों को जनता के सामने ले जाकर बीजेपी को सत्ता बेदखल कर दे। परिवर्तनशील समाज में यह कहीं भी असंभव नहीं लगता है।
मुद्दों पर फोकस जरूरी
भले ही बीजेपी वाली केंद्र की सरकार यह कहे कि उसके शासनकाल में सब ठीक हो गया है, ऐसा कुछ भी नहीं है। बड़े मुद्दों पर अभी तक कोई काम नहीं हो पाया है। आज करोड़ों बेरोजगार, आत्महत्या कर रहे किसान, नोटबंदी से तबाह व्यापारी-वर्ग और सामाजिक-धार्मिक विद्वेष का शिकार बनाए जा रहे दलित-मुसलमान विपक्ष की तरफ आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं, ऐसे में जरूरी है कि उनकी आशा को बनाए रखा जाए। यह अच्छा मौका है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के सामने आज आरटीआई के दायरे में खुद को लाकर हीरो बन जाने का नायाब अवसर है।
पहल को रंग में बदले
जेपी के शिष्य शरद यादव ने विपक्ष को एकजुट करने की पहल जरूर की है, लेकिन उन्हें अपनी छवि वामपंथी दिग्गज हरकिशन सिंह सुरजीत जैसी बनानी होगी, जिन्होंने बीजेपी के खिलाफ जनता दल, वाम दल और कांग्रेस को भानुमती के कुनबे की तरह जोड़ कर रखा था। उन्हें लोकनायक जयप्रकाश नारायण या डॉ. लोहिया की तरह स्वयं को जनता से जोड़ना होगा, जिससे उन्हें जनता का भारी नैतिक बल मिल सके।
बीजेपी भांप गई खतरा
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कांस्टिट्यूशनल क्लब में कहा था कि अगर हम सब मिल जाएं तो मोदी जी और बीजेपी कहीं दिखाई नहीं देंगे, यह समय की मांग के अनुसार राहुल की मंशा को भी दर्शाता है। इसके बाद एक चीज अवश्य होने लगी है कि बीजेपी में फड़फड़ाहट दिखने लगी है। ऐसे में, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कांग्रेस-मुक्त भारत के साथ-साथ अब विपक्ष-मुक्त भारत की मुहिम में जुट गए हैं, अस्तित्व का संकट विपक्ष के लिए फेवीकोल का काम करेगा। इसी चरण में आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने 27 अगस्त को पटना में विपक्ष की महारैली भी आयोजित की। वहीं, शरद यादव ने तय किया है कि विपक्षी दल अब से हर माह हर राज्य में कम से कम एक सम्मेलन अवश्य किया करेंगे।
गुजरात से बढ़ी है उम्मीद
गुजरात से राज्यसभा चुनावों में बाजी मारने वाले कांग्रेस के चाणक्य और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने अपनी प्रतिष्ठा बचा ली थी, इससे भी उम्मीद की किरण बन रही है। बड़े राजनीतिक ड्रामे के बाद जिस तरह पटेल ने चुनाव जीता, वह बीजेपी को आश्चर्यचकित करने के लिए काफी रहा। बशर्ते, इस दौरान कांग्रेस को भारी मशक्क्त करनी पड़ी। पी. चिदंबरम जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं को मोर्चा संभालना पड़ा था।
बीजेपी की राजनीतिक मजबूरी
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने इस बार 75 पार नेता रिटायर्ड यानि बुजुर्ग नेताओं को सरकार में सहभागिता से दूर करने की बात पर विराम लगा दिया। हाल ही में, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे अमित शाह ने जब 75 साल के नेताओं को चुनाव में टिकट देने की बात कही तो मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे और उम्रदराज होने के नाते शिवराज मंत्रीमंडल से विदा हुए बाबूलाल गौर की बांछे खिल गईं। लगातार नौ बार भोपाल की गोविंदपुरा विधानसभा सीट से जीत हासिल करने वाले बाबूलाल गौर के उस दर्द को अमित शाह ने दूर कर दिया, जो उनके अनुभव के आगे उम्र की सीमा के चलते छोटा हो चला था। बीजेपी हाईकमान के रुख में इस लचीलेपन से पार्टी के 75+ के करीब 25 नेताओं में एक बार फिर सक्रिय राजनीति में लौटने की उम्मीद जग गई है। यह नेता खासकर, उन्हीं 15 राज्यों से हैं, जहां 2019 के आम चुनाव तक विधानसभा चुनाव होने हैं। शाह का बयान गुजरात, हिमाचल, कर्नाटक के इस साल और मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में अगले साल होने वाले चुनाव को साधता है। इसी के साथ मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम, अरुणाचल, तेलंगाना, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भी चुनाव है, जिसमें से अधिकरतर में बीजेपी या उसके सहयोगियों की सरकार है। चतुर सुजान अमित शाह की रणनीति यह है कि मिशन 2019 और आगामी चुनावों में अनुभवी नेताओं का सहयोग मिले और भितरघात का खतरा भी कम रहे।

 

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