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गुरु तो गुरु ही रहेंगे Featured

Written by  Published in Opinion Wednesday, 05 September 2018 06:02

डॉ॰ अनीता शर्मा

(शिक्षाविद और साहित्यकार)

यह तन विष की बेलरी ,गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिले,तो भी सस्ता जान ।
न जाने कहाँ गुम हो गयी कबीरदासजी की कही इन पंक्तियों की गहराइयाँ ,अक्सर अखबारों मे शिक्षकों पर समाज की ,राजनेताओं की टिप्पणी देखती हूँ तो कहीं मन आहत होता है तो कभी अपने पेशे पर कोफ्त भी लेकिन जब गहराई से सोचती हूँ तो लगता है ‘ बिन गुरु ज्ञान कहाँ ‘ हमने जो पाया वो भी गुरु की बदौलत ,जो दे रहें है वह भी गुरु की बदौलत ,यह सत्य है कि कच्ची मिट्टी हैं बच्चे । 4-5 वर्ष के बच्चों को जो आप देंगे वही उसके मस्तिष्क पटल पर ऐसा अंकित होता है जिसे कोई भी मिटा नहीं पाता ।
महर्षि अरविंद के अनुसार-“शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर मालीहोते हैं ,संस्कारों की जड़ों मे खाद देने वाले और अपनेश्रम से सींचकर उन्हे शक्ति मे निर्मित करते है । संक्षेप में कहा जाये तो वास्तविक राष्ट्र निर्माता ही शिक्षक हैं राष्ट्र में युवा शक्ति का भंडार है जरूरत है नवीन दिशा देने की ।तो हो ये रहा है कि शिक्षा आज धन का पर्याय बनती जा रही है ।रोजगार कि मारामारी में अविभावक तो स्वयम सुबह से शाम व्यस्त है तो सारा का सारा दारोमदार शिक्षक के कंधों पर ।उसपर सरकारी विद्यालय के बच्चे, माता पिता चाहते तो है कि उनके बच्चे भी निजी विद्यालयों के बच्चों की तरह पढे लेकिन न तो उनके पास समय है ना ही ज्ञान है ऐसा भी होता है कि ज़्यादातर बच्चे केवल स्कूल मे ही आकर पढ़ाई करते है । पाठ का दूसरा पहलू अभ्यास तो छूट ही जाता है ।उसपर रोज बदलती व्यवस्था,बच्चों पर नए नए प्रयोग ,तो सारी व्यवस्था मे अव्यवस्थित एकलौता प्राणी कौन ---तो शिक्षक,इसे पढ़ाना नहीं आता ,यह विद्यालय नहीं जाता ,मोटी तंख्वाह वगैरह वगैरह......
तो व्यवस्था परिवर्तन भी कर सकते है शिक्षक ,चन्द्रगुप्त आज भी समाज मे कई है तलाश है तो फिर चाणक्य की ।पुरानी परम्पराओं को आत्मसात करे,शिक्षक से गुरु बनने की , तोआज भी कई शिक्षक है जो निःस्वार्थ इन्ही बच्चों के लिए समर्पित है । शिक्षक की भूमिका बहुत ही विस्तृत और विकसित है । बदलते समय के अनुसार आज ये प्रबन्धक ,प्रशासक ,एवं नेतृत्वकर्ता के रूप मे कार्यरत है ।जो शिक्षक आज भी अपनी गरिमा को बनाए हुए है ,जिनमे अपने शिक्षकीय ज्ञान के प्रति अभी भी अखंड अनुराग है जो निरंतर अपने अध्यवसाय को बनाए रखे है वो आज भी पूजनीय है ।
शिक्षकों का चिंतन ,चरित्र और व्यवहार ही बच्चों को प्रभावित करता है ।जरूरत है जरा ढर्रे से हटने की ,आज राष्ट्र की दशा देख कर फिर शिवाजी और चन्द्रगुप्त को गढ़ने की आवश्यकता है ।माना कि आज परिस्थितियाँ विपरीत हो रही,संचार क्रांति ने एक ओर नैतिक मूल्यों कि जड़ों को जहां हिलाकर रख दिया है वही दूसरी तरफ शिक्षकों के प्रति अविश्वास के भाव को भी भरा है । राष्ट्र हित से पहले स्वहित प्रमुख है तो निश्चित ही शिक्षकों की भूमिका चुनौती पूर्ण हो रही है ।जब तक नई पौध की जड़ों को नहीं मतबूत किया जाएगा तब तक सुंदर और नवीन राष्ट्र की कल्पना ही असंभव है ।हर युग मे जो जो राष्ट्र निर्माता होगा निस्संदेह वह गुरु ही होंगे । जब अपनी समस्त विशिष्टताओ को ये धारण करेंगे ,जिनके लिए राष्ट्र हिट ही एसबी कुछ होगा तो निःसन्देह ऐसे गुरु तो गुरु ही रहेंगे ।

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